
एक महत्वपूर्ण सवाल अक्सर उठता है कि क्या पुरुषों को अपनी समस्याओं और उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने का पर्याप्त मंच मिला है?
स्वराज इंडिया न्यूज ब्यूरो
लखनऊ।
भारत में महिलाओं के अधिकारों और उनके खिलाफ होने वाली हिंसा के लिए कई कानूनी उपाय और संरक्षण व्यवस्था मौजूद हैं। महिलाओं को हिंसा, उत्पीड़न और भेदभाव से बचाने के लिए समाज में जागरूकता और कानूनों के निर्माण की प्रक्रिया काफी लंबे समय से चल रही है। इस संदर्भ में राष्ट्रीय महिला आयोग ने अपनी भूमिका निभाते हुए लाखों महिलाओं को न्याय दिलाने की कोशिश की है। लेकिन एक महत्वपूर्ण सवाल अक्सर उठता है कि क्या पुरुषों को अपनी समस्याओं और उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने का पर्याप्त मंच मिला है? क्या पुरुषों के लिए भी ऐसा कोई आयोग होना चाहिए, जैसा कि महिलाओं के लिए है?
यह सवाल हाल ही में बेंगलुरु के होनहार ए.आई. इंजीनियर, अतुल सुभाष की खुदकुशी के बाद फिर से चर्चा में आया है। अतुल ने घरेलू हिंसा और अपने ससुराल पक्ष के उत्पीड़न से तंग आकर आत्महत्या कर ली। आत्महत्या से पहले उन्होंने एक वीडियो में आरोप लगाया था कि उनकी पत्नी ने उनपर झूठे आरोप लगाए, उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया और सिस्टम से उन्हें कोई मदद नहीं मिली। अतुल की मौत के बाद, इस बात ने एक बार फिर से सवाल खड़ा किया है कि क्या भारत में पुरुषों के लिए एक राष्ट्रीय आयोग की आवश्यकता है, जो उनकी समस्याओं को सुलझाने में मदद कर सके।
भारत में पुरुषों पर अत्याचार के मामलों पर चर्चा करना उतना आसान नहीं है, क्योंकि अधिकांश पुरुष इन मुद्दों को सार्वजनिक नहीं करते। उनके पास अपनी शिकायत दर्ज कराने के लिए कोई प्रभावी मंच नहीं होता। आंकड़े भी इस बात की ओर इशारा करते हैं कि पुरुषों के आत्महत्या के मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के अनुसार, 2021 में 1,64,033 लोगों ने आत्महत्या की। इनमें से 81,063 विवाहित पुरुष थे, जो पारिवारिक समस्याओं, दबाव और घरेलू हिंसा के कारण आत्महत्या करने को मजबूर हुए। यह आंकड़े स्पष्ट रूप से बताते हैं कि पुरुषों में मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं का सामना करने की क्षमता सीमित होती है, और वे पारिवारिक और घरेलू दबावों के कारण आत्महत्या कर लेते हैं। हालांकि, घरेलू हिंसा का शिकार होने के बावजूद अधिकांश पुरुष अपनी स्थिति को सार्वजनिक करने में संकोच करते हैं, क्योंकि समाज में पुरुषों के साथ होने वाली हिंसा पर बात करना एक वर्जित विषय बन चुका है
एनसीआरबी और अन्य कई संगठनों के अध्ययन में यह सामने आया है कि पुरुषों को घरेलू हिंसा और मानसिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। यहां तक कि नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 (NFHS-5) के आंकड़े भी यही दिखाते हैं कि 18 से 49 वर्ष की उम्र की 10% महिलाएं कभी अपने पति पर हाथ उठा चुकी हैं, और 11% महिलाएं पिछले एक साल में अपने पतियों के साथ हिंसा कर चुकी हैं। यह आंकड़े यह दर्शाते हैं कि पुरुषों के खिलाफ हिंसा और मानसिक उत्पीड़न की समस्या को नकारा नहीं जा सकता। लेकिन एक और मुद्दा है ये सब खुलकर सामने नहीं आ पाता, क्योंकि पुरुषों को हमेशा यह बताया जाता है कि उन्हें अपनी समस्याओं को छिपाना चाहिए, क्योंकि वे पुरुष हैं और उन्हें मजबूत रहना चाहिए।

भारत में पुरुष आयोग की आवश्यकता को लेकर कई तर्क दिए जा रहे हैं। सबसे पहले, यह सवाल उठता है कि क्या पुरुषों को भी महिलाओं के समान अधिकार और सुरक्षा मिलनी चाहिए। महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मामलों में सख्त कानून हैं, लेकिन इन कानूनों का दुरुपयोग कभी-कभी पुरुषों के खिलाफ भी किया जाता है।