
जिस तरह हमारा आपका मोबाइल नेटवर्क दिखाता है, काल कनेक्ट करता है लेकिन मोबाइल नेटवर्क को टावर से जोड़ने वाली तरंगे नही दिखाता फिर भी मोबाइल तो काम करता ही है। ठीक इसी तरह आपने बायोलॉजी पढ़ी हो या केमिस्ट्री, ऋषि परम्परा द्वारा लिखित आध्यात्मिक सिद्धांतो और परंपराओं का विज्ञान भी अंतिम सत्य है।
ऋषि अनुभव कहता है कि पानी को चाहे RO से फिल्टर कीजिये या UV से, किन्तु चौबीस घंटे से ज्यादा एकत्रित हुए पानी को बिना कॉटन के वस्त्र से छाने हुए नही पीना चाहिए और ना ही खाना पकाना चाहिये।
इस श्रष्टि के ज्ञात जल अवयवो में केवल गंगाजल ही एकमात्र है जिसमे कीड़े नही पड़ते, वह खराब नही होता। शेष RO और UV आपका वहम है क्योंकि आपका विज्ञान ही आज अपरिपक्व है।
उदाहरण के तौर पर आवर्त सारणी में तत्वों का मान आज आप जो तय करते हैं, कुछ साल बाद दुनियां कोई अन्य वैज्ञानिक आकर उसे झुठला देता है या नया तत्व खोजकर उसका स्थान बदल देता है।
विज्ञान हर चीज को समझ ही ले यह आवश्यक नही है क्योंकि विज्ञान वह चीज मात्र है जो किसी घटना या परिघटना में निहित कारणों का प्रयास करता है। वह कितना सफल है वह उक्त से स्पष्ट ही है।
किन्तु ऋषि परम्परा द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी प्रवाहित हुए सिद्धांत कभी नजरअंदाज नही करने चाहिए। आपका RO और UV तो इतना ज्यादा फिल्टर कर देता है कि खराब तत्वों के साथ साथ उन अच्छे तत्वों को भी फिल्टर कर देता है जो मानव शरीर के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। ज़रा नजर घुमाकर RO और UV का पानी पीने वालो तथा गावो में छानकर पानी पीने वाली की औसत आयु को अपनी आंखों से देख लीजिए। मेरी बात अक्षरशः सत्य सिद्ध होगी।
इसलिए यदि स्वस्थ रहना चाहते हैं, लम्बी आयु चाहते हैं तो खाने में इस्तेमाल होने वाला पानी कॉटन के वस्त्र से फिल्टर करने के उपरांत ही उपयोग में लें तथा उसे ही पियें। मुझे भी यह जानकारी उसी परम्परा के सन्त से प्राप्त हुई है जिन्होंने हमारी सभ्यता और संस्कारों को प्रवाहित करने का बीड़ा उठाया है।
मुझे यह जानकारी सद्गुरु सत्संग के माध्यम से अर्थात स्वामिनारायण सम्प्रदाय के पूज्य सन्त श्री प्रियदर्शन स्वामी जी से प्राप्त हुई है। सोचा आप सब से भी आपके लाभार्थ शेयर की जानी चाहिए। यह जानकारी अधिकाधिक लोगो तक पँहुचाएँ।