महर्षि परशुराम की जयंती पर विशेष:

-कुँवर समीर शाही
जब भृगुवंशी महर्षि जमदग्नि-पत्नी रेणुका के गर्भ से परशुराम का जन्म हुआ। यह वह समय था, जब सरस्वती और हषद्वती नदियों के बीच फैले आर्यावर्त में युद्ध और पुरु, भरत और तृत्सु, तर्वसु और अनु, द्रह्यू और जन्हू तथा भृगु जैसी आर्य जातियां निवासित थीं, जहां वशिष्ठ, जमदग्नि, अंगिरा, गौतम और कण्डव आदि महापुरुषों के आश्रमों से गुंजरित दिव्य ऋचाएं आर्य धर्म का संस्कार-संस्थापन कर रही थीं।
लेकिन दूसरी ओर संपूर्ण आर्यावर्त नर्मदा से मथुरा तक शासन कर रहे हैहयराज सहस्रार्जुन के लोमहर्षक अत्याचारों से त्रस्त था। ऐसे में युवावस्था में प्रवेश कर रहे परशुराम ने आर्य संस्कृति को ध्वस्त करने वाले हैहयराज की प्रचंडता को चुनौती दी और अपनी आर्यनिष्ठा, तेजस्विता, संगठन-क्षमता, साहस और अपरिमित शौर्य के बल पर वे विजयी हुए।
परशुरामजी वैदिक और पौराणिक इतिहास के सबसे कठिन और व्यापक चरित्र हैं। उनका वर्णन सतयुग के समापन से कलियुग के प्रारंभ तक मिलता है। इतना लंबा चरित्र, इतना लंबा जीवन किसी और ऋषि, देवता या अवतार का नहीं मिलता। वे चिरंजीवियों में भी चिंरजीवी हैं। उनकी तेजस्विता और ओजस्विता के सामने कोई नहीं टिका। न शास्त्रास्त्र में और न शस्त्र-अस्त्र में।
वे अक्षय तृतीया को जन्मे हैं इसलिए परशुराम की शस्त्र-शक्ति भी अक्षय है और शास्त्र-संपदा भी अनंत है। विश्वकर्मा के अभिमंत्रित दो दिव्य धनुषों की प्रत्यंचा पर केवल परशुराम ही बाण चढ़ा सकते थे। यह उनकी अक्षय शक्ति का प्रतीक था यानी शस्त्र-शक्ति का ‘परशु’ प्रतीक है पराक्रम का। ‘राम’ पर्याय है सत्य सनातन का। इस प्रकार परशुराम का अर्थ हुआ पराक्रम के कारक और सत्य के धारक। वे शक्ति और ज्ञान के अद्भुत पुंज थे।
परशुरामजी के प्रथम गुरु महर्षि विश्वामित्र ही थे जिन्होंने परशुरामजी को बचपन में शस्त्र संचालन की शिक्षा दी थी। महर्षि विश्वामित्रजी ने परशुरामजी को यह शिक्षा तब दी थी, जब विश्वामित्र महर्षि नहीं बने थे, वे तब तक गद्दी पर भी नहीं बैठे थे, केवल युवराज थे। कहने का आशय यह है कि परशुरामजी की वंश-परंपरा में ब्राह्मणों और क्षत्रियों में कोई भेद नहीं था। उनकी कुल परंपरा में ऋषियों और राजकन्याओं के बीच इतने विवाह-संबंध स्थापित हुए कि यह वर्गीकरण करना मुश्किल है कि कौन ब्राह्मण था और कौन क्षत्रिय। बावजूद इसके, कुछ लोग यह प्रचार करते हैं कि परशुरामजी ने क्षत्रियों के विरुद्ध अभियान छेड़ा और धरती को क्षत्रियविहीन करने का संकल्प लिया। यह प्रचार एकदम असत्य, झूठा और भारतीय समाज में वैमनस्य पैदा करने वाला है।
परशुराम ज्ञानार्जित वचन और पराक्रम दोनों से अपने विरोधी को श्रीहीन करने में पूर्णतया समर्थ थे। अतीत में एक लंबे समय तक चलने वाले देश के आंतरिक युद्ध के नायक थे परशुराम और इसलिए कई युगों तक उनका प्रभाव बना रहा। यह संभवत: वही दीर्घकालिक युद्ध था जिसमें कभी क्षत्रिय विश्वामित्र और महामुनि वशिष्ठ भी भिड़े थे और विश्वामित्र अकस्मात कह पड़े थे… धिग बलम क्षत्रिय बलम ब्रह्म तेजो बलम बलम
एकेन ब्रह्मदण्डेन सर्वस्त्राणि हतानि मे
(वाल्मीकि रामायण) परशुरामजी का चरित्र भले ही पौराणिक हो, मगर उस चरित्र को सफल रूप में प्रस्तुत करना हमारी संस्कृति और सामाजिक स्वरूप के लिए नितांत आवश्यक है। आज यहां के जन्मना ब्राह्मण परशुराम को अपनी जाति का गौरव एवं शौर्य का प्रतीक माने हुए हैं, मगर उन्हें ऐसे महान नायक के गुणों का भी समावेश अपने में करना होगा। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इस महान व्यक्तित्व का आह्वान निश्चय ही मानव जाति के लिए कल्याणकारी होगा।