
स्वराज इंडिया न्यूज ब्यूरो
कानपुर। आज के शिक्षा परिदृश्य में अक्सर देखा जाता है कि शिक्षक बच्चों की याद्दाश्त को मुख्य सफलता मानते हैं। वीडियो और सोशल मीडिया पर यह गर्व के साथ प्रदर्शित किया जाता है कि बच्चे सभी राज्यों, जिलों के नाम या बड़े पहाड़े एक सांस में गिना सकते हैं हालांकि यह उपलब्धि उनके स्मरण-शक्ति को दिखाती है लेकिन क्या यह उनकी समझ और आलोचनात्मक सोच का प्रमाण हो सकता है। शिक्षाशास्त्र के अनुसार स्मरण-शक्ति शिक्षा का केवल एक चरण है। जब बच्चे केवल जानकारी याद करने तक सीमित रह जाते हैं तो उनकी रचनात्मकता और समस्याओं को सुलझाने की क्षमता का विकास अवरुद्ध हो सकता है। यह आवश्यक है कि शिक्षण विधियां बच्चों को सोचने, तर्क करने और नए दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा दें। शिक्षाशास्त्र में सीखने की प्रक्रिया को तीन चरणों में देखा जाता है। ज्ञान, समझ और अनुप्रयोग। तथ्यों को याद करना ज्ञान का हिस्सा है लेकिन इसका असली महत्व तब होता है जब छात्र उन्हें समझने और दैनिक जीवन में लागू करने की क्षमता विकसित करते हैं। जब बच्चा राज्यों और जिलों के नाम याद करता है तो क्या वह यह समझता है कि इन राज्यों की भौगोलिक, सांस्कृतिक या आर्थिक विशेषताएं क्या हैं ? क्या पहाड़े रटने से वह गणितीय समस्याओं का समाधान बेहतर ढंग से कर पाता है ? सीखने की प्रक्रिया में जानकारी को संदर्भ में रखना और उसे दैनिक जीवन से जोड़ना अत्यंत आवश्यक है इसके लिए छात्रों को जानकारी देने के बजाय उनसे प्रश्न पूछें, जैसे यह जानकारी आपके लिए कैसे उपयोगी हो सकती है। छात्रों को उनके विचार साझा करने और नए दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रोत्साहित करें, तथ्यों को कहानियों से जोड़ें राज्यों की राजधानियों को याद कराने के बजाय उनसे संबंधित ऐतिहासिक या सांस्कृतिक कहानियां साझा करें। छात्रों को परियोजनाओं में शामिल करें जैसे कि नक्शा बनाने या दैनिक जीवन में गणित का उपयोग ढूंढने का काम। बच्चों को गलतियाँ करने दें और फिर उन पर विचार करने के लिए प्रेरित करें। शिक्षकों को यह समझना होगा कि बच्चों की समझ को प्राथमिकता देना ही सही शिक्षा है। केवल स्मरण-शक्ति को महत्व देकर हम बच्चों को यांत्रिकता की ओर धकेलते हैं।

शिक्षा का उद्देश्य उन्हें ऐसा नागरिक बनाना है जो समस्याओं को समझ सके और रचनात्मक समाधान दे सके। इसके लिए छात्रों को उन्हें विषयों को अपने दृष्टिकोण से देखने की स्वतंत्रता दें। संभव हो तो शिक्षकों और माता-पिता के लिए एक सहयोगी वातावरण बनाएं। बच्चों को सवाल पूछने और नई चीजें खोजने के लिए प्रोत्साहित करें। याद्दाश्त केवल पहला कदम है लेकिन समझ, तर्क और रचनात्मकता की मंजिल पर पहुंचना ही सच्ची शिक्षा है। आइए हम शिक्षण में इस दृष्टिकोण को अपनाएं और बच्चों को उनकी पूरी क्षमता का एहसास कराएं ताकि बच्चे भविष्य में कुछ बेहतर कर सकें।