
इतिहासकार डॉक्टर संग्राम सिंह ने शासन प्रशासन से की ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षित करने की मांग
इतिहासकार के साथ अपर जिलाधिकारी उमेश चंद्र निगम ने देखे हजारों साल पुराने शैल चित्र
रतन पटेल, स्वराज इंडिया
चित्रकूट।
भगवान श्रीराम की तपोभूमि के रूप में समूचे विश्व में विख्यात अरण्य तीर्थ चित्रकूट के खंडेहा गांव में मोहनी के घनघोर जंगल में स्थित दशरथ घाट हजारों साल पुराने अनेक ऐतिहासिक धरोहरों को अपने गर्भ में छिपाए हुए है।यह स्थल धर्म, अध्यात्म, पुरातत्व व इतिहास की दृष्टि से बड़े महत्व का है।यह स्थान प्राकृतिक दृष्टि से बहुत सुंदर है। यहां की कलाकृतियां ,स्थापत्य व शैल चित्र अपनी विशिष्टता के द्योतक हैं।जिले के सुप्रसिद्ध इतिहासकार डॉक्टर संग्राम सिंह ने शासन प्रशासन से चित्रकूट के गौरवशाली ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षित करने की मांग की है।

अरण्य तीर्थ चित्रकूट का दशरथ घाट स्थल ऐसा स्थल है जहां पर बड़ी बड़ी शिलाओं में ही मूर्तियों का उत्कीर्णन है।पूरे चित्रकूट में इस तरह की मूर्तियों का अंकन नहीं दिखाई पडता है। इसलिए यह स्थान अपनी विशिष्टता का परिचायक है। यहां की मूर्तियों में शेषशायी विष्णु की मूर्ति अपनी दुर्लभ कलात्मकता की परिचायक है। यहां के तमाम जगहों में शिलाओं पर ही मूर्तियों का उत्कीर्णन दिखाई पड़ता है।पूरे क्षेत्र में वहां एक दर्जन शिवलिंग दिखाई पड़ते हैं। यहां पर कल कल बहता पानी का झरना अपने नैसर्गिक सौंदर्य के लिए ख्यात है।झरने का पानी स्वादिष्ट,सुपाच्य व स्वास्थ्यवर्धक है। यहां पर हजारों साल पुराने दुर्लभ प्रागैतिहासिक कालीन शैल चित्रों के प्रमाण मिल रहे हैं। इतिहासकार डॉ० संग्राम सिंह ने बताया है कि मूलत:यह स्थान प्रागैतिहासिक कालीन सभ्यता व संस्कृति का संवाहक स्थल है। आदिम मानव यहां की इन गुफाओं में रहता था।अपने क्रियाकलापों को इन्हीं खुले शिलाखंडों में अंकित करता था। यहां के जंगलों में हेमेटाइट प्रकार अयस्क पाया जाता था।यह लाल गेरु रंग का होता था। पशुओं की चर्बी व जंगलों में मिलने वाली गोंद या वृक्षों की छाल को मिलाकर गाढ़ा लाल रंग का लेप तैयार करते थे।वृक्षों की टहनी की कूची बनाकर इसी लेप द्वारा चित्रकारी करते थे।इसका वर्ण्य विषय तत्कालीन सामाजिक जीवन की क्रियाकलापों का निरुपण था।

शोधकर्ता डॉ०संग्राम सिंह ने बताया कि हजारों साल व्यतीत हो जाने के बाद भी चित्रकूट के पाठा के जंगल में सैकड़ों की संख्या में शैल चित्र आज भी सुरक्षित हैं।इसमें जंगली पशुओं का अंकन,धनुष बाण लिए शिकारी के रुप में अंकन तथा विभिन्न पशुओं के झुण्ड प्रदर्शित हैं।दशरथ घाट के जंगल में ऊपर जल स्रोत के उद्गमस्थल के पास अलग अलग शिलाओं में मूर्तियों का उत्कीर्णन विशिष्ट है। वहीं पास में एक बड़ी शिला में चरणचिन्हों का अंकन बडे़ महत्व का है।दो चरण चिन्ह बहुत बड़े बड़े हैं वहीं पास में दो चरण चिन्ह छोटे छोटे अंकित हैं। यहां श्री राम के आगमन से लेकर आज तक यह स्थान धार्मिक क्रियाविधियों के लिए पावन स्थान माना जाता है। वस्तुत:इस स्थान को पर्यटन की दृष्टि से विकसित कराये जाने की महती आवश्यकता है।सघन जंगली इलाके में स्थित होने के कारण आवागमन के साधन नहीं पहुंच पाते हैं। सम्पर्क मार्ग द्वारा जोड़े जाने की महती आवश्यकता है।
