
स्वराज इंडिया न्यूज ब्यूरो, अयोध्या। अयोध्या के जिलाधिकारी को मेडिकल धांधली की जांच का जिम्मा सौंपा गया है। उन्होंने इस मामले की जांच के लिए एडीएम की अध्यक्षता में एक समिति गठित कर दी है। लेकिन बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या यह समिति निष्पक्ष जांच कर पाएगी? और अगर जांच ईमानदारी से होती है, तो क्या समाज के सफेदपोशों पर कार्रवाई हो पाएगी?
यह पहला मामला नहीं है जब मेडिकल क्षेत्र में धांधली उजागर हुई हो। पूर्व में जब आचार्य मनोज दीक्षित कुलपति थे, तब नकल रोकने के लिए परीक्षा केंद्रों में बदलाव किया गया था। इसका नतीजा यह हुआ कि नकल के सहारे डॉक्टर बनने वाले छात्र बड़ी संख्या में फेल हो गए। इससे सत्ता, विपक्ष और उच्च पदस्थ अधिकारियों में खलबली मच गई थी। इसके बाद दीक्षित जी को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा और उनका कार्यकाल समाप्त होने के बाद उन्हें पुनर्नियुक्ति नहीं मिली।
आज भी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। अवध विश्वविद्यालय के परीक्षा नियंत्रक उमानाथ को भ्रष्टाचार के केंद्र में माना जाता है। उनके खिलाफ कई शिकायतें लखनऊ से लेकर दिल्ली तक भेजी गईं, लेकिन हर शिकायत पर उच्च शिक्षा विभाग के अधिकारी और मंत्री संतुष्ट ही नजर आते हैं।
अब देखना यह होगा कि इस बार जांच समिति कितनी निष्पक्ष रहती है और क्या सच में दोषियों पर कोई ठोस कार्रवाई होती है या फिर यह मामला भी रसूखदारों के दबाव में धुंधला पड़ जाएगा? फिलहाल, रामराज में तो यही कहा जाता है – “समरथ को नहीं दोष गोंसाईं”।