“चुनाव प्रक्रिया भारत में लोकतंत्र की बुनियाद है । चुनावी प्रक्रिया संवैधानिक ढांचे और संविधान की मूल भावना व संरचना के पथ से डिगती हुई दिखती है तो सवाल वाजिब हैं और जवाब में समाधान और चिंता का निराकरण नीति नियंताओं की जिम्मेवारी में है। राजनीति से ऊपर संविधान और देश है और देश के मजबूत लोकतंत्र से कम कुछ भी स्वीकार्यता नहीं होनी चाहिए।” – पंकज कुमार सिंह (लेखक एवं विचारक)
एक देश एक चुनाव पर पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली समिति ने 14 मार्च 2024 को अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंप दी गई है। 18 हजार से अधिक पन्नों में सिमटी इस रिपोर्ट में देश भर में हर साल होने वाले कई चुनावों से बचने की कवायद पेश की है और इसके लिए सरकार से कानूनी रूप से एक मान्य तंत्र विकसित करने की अपेक्षा रखी है।
कोविंद समिति के समक्ष रायशुमारी की चर्चा के दौरान देश के चार मुख्य न्यायाधीशों ने लोकसभा, विधानसभाओं व स्थानीय निकायों के चुनाव एक साथ कराए जाने का समर्थन किया है। वहीं समिति ने इस सिफारिश को लागू कर देश में सभी चुनाव एक साथ कराने के लिए संविधान में कई प्रावधानों में संशोधन की भी सिफारिश की है। इसमें अधिकांश प्रावधानों के संशोधन के लिए राज्यों के समर्थन की आवश्यकता नहीं होती है। वहीं उच्च न्यायालय के तीन पूर्व मुख्य न्यायाधीशों ने इस पर विरोध भी दर्ज कराया है। इनका कहना है कि देश में सभी चुनाव एक साथ कराने की अवधारणा लोकतंत्र के खिलाफ होगी। कलकत्ता हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश गिरीश चंद्र गुप्ता ने भी एक साथ चुनाव कराने के विचारों का विरोध करते हुए समिति से कहा था कि यह लोकतंत्र के सिद्धांतों के विपरीत है मद्रास हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश संजीव बनर्जी ने विरोध करते हुए कहा कि इससे भारत का संघीय ढांचा कमजोर होगा। देश में सभी चुनाव एक साथ कराने का विचार क्षेत्रीय मुद्दों के लिए नुकसानदायक होगा।
हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस एपी शाह ने लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति पर अंकुश लगाने को लेकर आशंका जताई है, वहीं विरोध में कई क्षेत्रीय दलों ने एक सुर में कहा है कि एक साथ एक चुनाव कराने की अवधारणा अलोकतांत्रिक है और संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली के विरुद्ध है। एक मत में यह सामने आया है कि एक चुनाव की अवधारणा भारत के संघीय ढांचे और संविधान की मूल संरचना और देश की संघीय राजनीति को खत्म कर देगा।
राजनीतिक दल हों, न्यायाधीश हों, जनसेवक या आम लोग हों जिन्होंने भी एक देश एक चुनाव की अवधारणा का विरोध किया है उसके मूल में राज्यों के अधिकार की रक्षा, क्षेत्रीय भावनाओं की अभिव्यक्ति में कटौती का डर या लोकतंत्र और संविधान की मूल भावना कमजोर होने का सवाल है और यह बड़े स्तर पर उभर कर सामने आ रहा है कि यह भारतीय राजनीतिक व्यवस्था को पूरी तरह से बदलकर रख देगा। वहीं एक राष्ट्र एक चुनाव संबधी उच्च स्तरीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि एक चुनाव की अवधारणा को 1983 के बाद कई रिपोर्ट और अध्ययनों में शामिल किया गया है। 1983 भारत निर्वाचन आयोग की ओर से एक राष्ट्र एक चुनाव का सुझाव पहली बार दिया गया था। 1999 में विधि विधि आयोग के अध्यक्ष बीपी जीवन रेड्डी ने चुनावी कानूनों में सुधार पर अपनी रिपोर्ट पेश की थी वहीं वर्ष 2018 में विधि आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति बीएस चौहान ने देश में एक साथ चुनावों पर रिपोर्ट जारी की थी। 1 सितम्बर 2023 को केन्द्र सरकार ने पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक राष्ट्र एक चुनाव की एक समिति गठित की जिसकी रिपोर्ट बीते 14 मार्च को राष्ट्रपति मुर्मू को सौंपी गई है।चुनाव को एक साथ समकालिक बनाने के लिए अनुच्छेद 82 ए जोड़ने की सिफारिश की है। यदि अनुच्छेद 24 ए जून 2024 में प्रभावी हुआ तो लोकसभा – विधानसभाओं का कार्यकाल 2029 में समाप्त हो जाएगा। एक देश एक चुनाव को लेकर विधि आयोग भी अलग से रिपोर्ट सरकार को सौंपेगा। ऐसे में एक चुनाव के समर्थन के निमित्त विधि आयोग 2029 से देश में सभी चुनाव एक साथ चुनाव कराने की सिफारिश करेगा। यह भी कहा है कि त्रिशंकु सदन या अविश्वास प्रस्ताव के चलते सरकार गिर जाने पर विधि आयोग द्वारा एकीकृत सरकार के प्रावधान की सिफारिश करने की संभावना है इसके लिए नया अध्याय जोड़ने को संविधान में संशोधन की सिफारिश करेगा।
केंद्र की भाजपा सरकार के प्रवक्ता नलिन कोहली ने कहा है कि एक देश एक चुनाव राजनीतिक मुद्दा नहीं है इसका उद्देश्य धन और अन्य संसाधनों को बचाना है। एक साथ चुनाव से धन और समय दोनों की बचत होगी।
परिणामतः यह विचारणीय है कि आज़ादी के बाद 26 जनवरी 1950 से लागू भारतीय संविधान के निर्देशन में देश में बहुत सी सरकारें आईं और चली गईं, सभी के योगदान से वैश्विक पटल पर भारत ने तरक्की की लम्बी दौड़ में बड़ी जीत हासिल की और आज दुनिया की मुख्यधारा में शामिल है । चुनाव प्रक्रिया भारत में लोकतंत्र की बुनियाद है । चुनावी प्रक्रिया संवैधानिक ढांचे और संविधान की मूल भावना व संरचना के पथ से डिगती हुई दिखती है तो सवाल वाजिब हैं और जवाब में विश्वास की एकरूपता, समाधान और चिंता का निराकरण नीति नियंताओं की जिम्मेवारी में है। राजनीति से ऊपर संविधान और देश है और देश के मजबूत लोकतंत्र से कम कुछ भी स्वीकार्यता नहीं होनी चाहिए।
(लेखक सूचना तकनीकी क्षेत्र से हैं, मीडिया से जुड़े हैं और यह लेखक की निजी विचार हैं)