Friday, April 4, 2025
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One Nation One Election: क्या एक साथ चुनाव के लिए तैयार है देश? तो भाजपा इसलिए दे रही अबकी बार 400 पार का नारा

राजनीतिक विश्लेषक संजय शर्मा के अनुसार, देश के लिए यह एक बड़ा बदलाव होगा। इसके लिए देश की जनता को मानसिक तौर पर तैयार करना होगा। साथ ही विपक्ष का साथ मिलने पर ही इस तरह के किसी बड़े बदलाव की सफलता निर्भर करती है। ऐसे में सरकार को उसे भी साथ में लाना होगा…

रामनाथ कोविंद समिति ने ‘एक देश, एक चुनाव’ का मसौदा राष्ट्रपति को सौंप दिया है। दावा है कि इस मसौदे में समिति ने 2029 में देश में एक साथ लोकसभा और सभी विधानसभाओं का चुनाव कराने का प्रस्ताव किया है। पहले चरण में लोकसभा और विधानसभाओं और बाद में दूसरे चरण में नगर निगम स्तर के चुनाव कराने का सुझाव दिया गया है।

लेकिन देश की राजनीति में यह एतिहासिक बदलाव आना तभी संभव होगा, जब वर्तमान सरकार यानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो तिहाई बहुमत के साथ सत्ता में लौटें। साथ ही, संवैधानिक बाध्यता है कि इस कानून को लागू करने से पहले देश के कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं से पास कराना पड़ेगा। संभवतः यही कारण है कि भाजपा लगातार अपने लिए 370 सीटें और एनडीए के लिए 400 सीटों पर जीत का लक्ष्य लेकर चल रही है, जिससे लोकसभा चुनाव 2024 के बाद इस बिल को संसद से पास कराने में कोई परेशानी न हो।        

‘बड़े बदलाव का लक्ष्य लेकर चल रही सरकार’

राजनीतिक विश्लेषक संजय शर्मा के अनुसार, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल सहित विपक्ष के सभी दल यह आरोप लगा रहे हैं कि सरकार बड़ा जनमत हासिल कर संविधान में बड़े बदलाव करना चाहती है। जनता का साथ पाने के लिए वे आरोप लगा रहे हैं कि सरकार आरक्षण समाप्त करना चाहती है। लेकिन अब यह स्पष्ट हो चुका है कि सरकार बड़े बदलाव का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रही है। मोदी या सरकार की दलितों-आदिवासियों के प्रति देखी जा रही प्रतिबद्धता को देखकर यह कहना सही नहीं होगा कि वह आरक्षण जैसी व्यवस्था को समाप्त करने की बात सोच भी सकती है।

उन्होंने कहा कि यह समझा जाना चाहिए कि भाजपा का यह कोई नया एजेंडा नहीं है। उसके नेता पहले से एक देश, एक चुनाव की बात करते रहे हैं। इसके पीछे उनका तर्क देश को बार-बार के चुनावों से बचाना और आर्थिक बचत करना रहा है। इससे सहमत या असहमत होने के अपने-अपने कारण हो सकते हैं। लेकिन सत्य यह है कि इस विचार को कई विश्लेषक देश की अर्थव्यवस्था और विकास के लिए उचित समझते हैं।

लेकिन जनता को तैयार करना बड़ी चुनौती

संजय शर्मा के अनुसार, देश के लिए यह एक बड़ा बदलाव होगा। इसके लिए देश की जनता को मानसिक तौर पर तैयार करना होगा। साथ ही विपक्ष का साथ मिलने पर ही इस तरह के किसी बड़े बदलाव की सफलता निर्भर करती है। ऐसे में सरकार को उसे भी साथ में लाना होगा। कोई बड़ा निर्णय लागू करने से पहले सभी पक्षों से बातचीत करने से बाद में उसको लेकर व्यक्त की जा रही तमाम आशंकाएं समाप्त हो जाती हैं। ऐसे में सरकार को कोई बड़ा कदम उठाने से पहले सबको साथ लाने या कम से कम चर्चा करने की आवश्यकता समझनी होगी।

इस समस्या का समाधान खोजना होगा

राजनीतिक विश्लेषक धीरेंद्र कुमार ने कहा कि इस तरह की कोई व्यवस्था लागू करने से पहले इन प्रश्नों पर विचार करना होगा कि यदि बीच में कोई सरकार गिर जाती है, तो उसके स्थान पर नई सरकार का गठन कैसे होगा। यदि उसका चुनाव होता है तो क्या वह पांच साल के लिए होगा, या पांच साल में बचे कार्यकाल के लिए होगा। इस समय भी सांसद-विधायक के इस्तीफे के बाद उपचुनाव होने पर नया जनप्रतिनिधि केवल शेष कार्यकाल के लिए ही चुना जाता है। इस तरह के प्रश्नों पर विचार करना होगा।

धीरेंद्र कुमार ने कहा कि यदि 2029 में सभी विधानसभाओं के चुनाव भी साथ कराने का निर्णय किया जाता है, तो इससे उन राज्यों का विरोध सामने आ सकता है, जहां विपक्ष की सरकारें हैं, लेकिन उस समय उनका कार्यकाल केवल एक-दो साल ही हुआ हो। ऐसे में उनका इस बड़े बदलाव के लिए सहमत होना मुश्किल होगा। लेकिन चूंकि यह एक बड़ा बदलाव होगा और यह कदम देशहित में होगा, सरकार को इसके लिए सबकी सहमति पाने की कोशिश करनी चाहिए।

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