इस दिन नंदगाँव के ग्वाल बाल होली खेलने के लिए राधा रानी के गाँव बरसाने जाते हैं और विभिन्न मंदिरों में पूजा अर्चना के पश्चात नंदगांव के पुरुष होली खेलने बरसाना गांव में आते हैं और बरसाना गांव के लोग नंदगांव में जाते हैं। इन पुरूषों को होरियारे कहा जाता है। बरसाना की लट्ठमार होली के बाद अगले दिन यानी फाल्गुन शुक्ला दशमी के दिन बरसाना के हुरियार नंदगांव की हुरियारिनों से होली खेलने उनके यहां पहुंचते हैं। तब नंदभवन में होली की खूब धूम मचती है।

दरअसल बरसाना की लठामार होली भगवान कृष्ण के काल में उनके द्वारा की जाने वाली लीलाओं की पुनरावृत्ति जैसी है। माना जाता है कि कृष्ण अपने सखाओं के साथ इसी प्रकार कमर में फेंटा लगाए राधारानी तथा उनकी सखियों से होली खेलने पहुंच जाते थे तथा उनके साथ ठिठोली करते थे जिस पर राधारानी तथा उनकी सखियां ग्वाल वालों पर डंडे बरसाया करती थीं। ऐसे में लाठी-डंडों की मार से बचने के लिए ग्वाल वृंद भी लाठी या ढ़ालों का प्रयोग किया करते थे जो धीरे-धीरे होली की परंपरा बन गया। उसी का परिणाम है कि आज भी इस परंपरा का निर्वहन उसी रूप में किया जाता है।

जब नाचते झूमते लोग गांव में पहुंचते हैं तो औरतें हाथ में ली हुई लाठियों से उन्हें पीटना शुरू कर देती हैं और पुरुष खुद को बचाते भागते हैं। लेकिन खास बात यह है कि यह सब मारना पीटना हंसी खुशी के वातावरण में होता है। औरतें अपने गांवों के पुरूषों पर लाठियां नहीं बरसातीं. बाकी आसपास खड़े लोग बीच बीच में रंग बरसाते हुए दिखते हैं।
इस होली को देखने के लिए बड़ी संख्या में देश-विदेश से लोग बरसाना आते हैं। यह लट्ठमार होली आज भी बरसाना की औरतों/लड़कियों और नंदगांव के आदमियों/लड़कों के बीच खेली जाती है।
ब्रज में बसंत पंचमी पर होली का डंडा गड़ने के साथ ही ब्रज के सभी मंदिरों और गांव में होली महोत्सव की शुरुआत हो जाती है। यह 40 दिनों तक चलता है,लेकिन खासतौर से होली महोत्सव फाल्गुन शुक्लपक्ष अष्टमी से यानीलड्डू फेक होली से शुरू होता है।! होली के त्योहार को गोकुल, वृंदावन और मथुरा में बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता है। यहां रंग वाली होली से पहले लड्डू, फूल और छड़ी वाली होली भी मनाई जाती है। इसके बाद बरसाने और नंदगांव में लठमार होली का आयोजन होता है। ब्रज के होली कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए देश और दुनियाभर से श्रद्धालु आते हैं।

बांके बिहारी मंदिर में परंपरानुसार वसंत पंचमी से गुलाल की होली शुरू हो जाती है। 40 दिन पहले शुरू होने वाले इस उत्सव के दौरान बांके बिहारी मंदिर में परंपरा के अनुसार सुबह-शाम होली के गीत कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। मंदिर के पुजारी भगवान को हर दिन गुलाल लगाने के बाद भक्तों पर भी प्रसाद के रूप में गुलाल का छिड़काव करते हैं। इसके लिए केवल प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल होता है,जिन्हें फूलों की मदद से तैयार किया जाता है।
बरसाने की लड्डू होली : लड्डू होली की शुरुआत लाडली मंदिर से होती है। देश-विदेश से आए राधा-कृष्ण के भक्त एक दूसरे पर लड्डू और अबीर-गुलाल उड़ाते हैं। ऐसा माना जाता है कि लड्डू की होली खेलने की परंपरा श्रीकृष्ण के बालपन से जुड़ी है। कहा जाता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण और नंद गांव के सखाओं ने बरसाना में होली खेलने का न्योता स्वीकार कर लिया था, तब पहले वहां खुशी में लड्डू की होली खेली गई थी। यही परंपरा आज भी चली आ रही है। इस परंपरा के तहत भक्त पहले राधा रानी मंदिर के पुजारियोंपर लड्डू फेंकते हैं और उसके बाद अपने साथ लाए लड्डुओं को एक दूसरे पर फेंकते हैं। वे नाचते गाते गुलाल उड़ाते हैं।

लट्ठमार होली-बरसाने और वृंदावन : बरसाने मे नंदगांव से सखा बरसाने आते हैं और बरसाने की गोपियां उन पर लाठियां बरसाती हैं। बरसाना के अलावा मथुरा, वृंदावन, नंदगांव में लठमार होली खेली जाती है। बरसाने की गोपियां यानी महिलाएं सखाओं को प्रेम से लाठियों से पीटती हैं और सखा उनसे बचने की कोशिश करते हैं। इस दौरान गुलाल-अबीर उड़ाया जाता है। अगले दिन बरसाने वाले वृंदावन की महिलाओं के संग होली खेलने जाते हैं। इस तरह की होली बरसाने और वृंदावन के मंदिरों में खेली जाती हैं। इस होली की खासियत ये है कि इसमें दूसरे गांव से आए लोगों पर ही लाठियां बरसती हैं। अपने गांव वालों पर लाठियां नहीं चलाई जातीं।
वृंदावन में फूलों की होली : बांके बिहारी मंदिर में रंगभरनी एकादशी पर फूलों की होली खेली जाती है। ये सिर्फ 15 से 20 मिनट तक चलती है। इस होली में बांके बिहारी मंदिर के कपाट खुलते ही पुजारी भक्तों पर फूलों की वर्षा करते हैं। इस होली के लिए खासतौर से कोलकाता और अन्य जगहों से भारी मात्रा में फूल मंगाए जाते हैं। भगवान बांके बिहारी जिस रंग से होली खेलते हैं उसके लिए एक क्विंटल से ज्यादा सूखे फूलों से रंग तैयार किया जाता है। सबसे पहले भगवान पर रंग का शृंगार होता है। इसके बाद भक्तों पर गेंदा, गुलाब, रजनीगंधा जैसे सुगंधित फूलों की पंखुड़ियां और रंग बरसाए जाते हैं।
गोकुल की छड़ीमार होली : गोकुल बालकृष्ण की नगरी है। यहां उनके बालस्वरूप को ज्यादा महत्व दिया जाता है। इसलिए श्रीकृष्ण के बचपन की शरारतों को याद करते हुए गोकुल में छड़ीमार होली खेली जाती है। यहां फाल्गुन शुक्लपक्ष द्वादशी को प्रसिद्ध छड़ीमार होली खेली जाती है। जिसमें गोपियों के हाथ में लट्ठ नहीं, बल्कि छड़ी होती है और होली खेलने आए कान्हाओं पर गोपियां छड़ी बरसाती हैं। मान्यता के अनुसार बालकृष्ण को लाठी से चोट न लग जाए, इसलिए यहां छड़ी से होली खेलने की परंपरा है।
गोकुल में होली द्वादशी से शुरू होकर धुलेंडी तक चलती है। दरअसल, कृष्ण-बलराम ने यहां ग्वालों और गोपियों के साथ होली खेली थी। कहा जाता है कि इस दौरान कृष्ण भगवान सिर्फ एक दिन यानी द्वादशी को बाहर निकलकर होली खेला करते थे। गोकुल में बाकी दिनों में होली मंदिर में ही खेली जाती है।
रंगों की होली : चतुर्दशी से 3 दिन तक रंग वाली होली खेली जाती है। रंगों का ये उत्सव मंदिरों में भी मनाया जाता है। इसमें सूखे फूलों के रंगों के साथ ही अबीर, गुलाल और अन्य रंग भी उड़ाए जाते हैं। ब्रज के फालेन गांव में होलिका दहन पर पुरोहित बिना कपड़ों के नंगे पैर जलती होली के बीच में से निकलता है। इस तरह ब्रज का होली उत्सव मनाया जाता है।
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