
तमाम पैसा खर्च करने के बाद भी गति नहीं पकड पा रहा आलोक मिश्रा का चुनाव!
–काॅडर स्तर के कार्यकर्ताओं में उत्साह की कमी
–सिर्फ गिने चुने नेताओं और पदाधिकारियों से घिरे हैं गठबंधन प्रत्याशी आलोक मिश्रा
–चुनाव प्रचार के लिए ढूंढे नहीं मिल रहे कार्यकर्ता
मुख्य संवाददाता, स्वराज इंडिया
कानपुर।
कानपुर सहित पूरे यूपी में अपना वजूद बचाने के लिए संघर्ष कर रही कांग्रेस के लिए इस बार की राह भी आसान नहीं है। चैथे चरण की वोटिंग के लिए महज 10 दिन से भी कम का समय बचा है। कानपुर से कांग्रेस गठबंधन प्रत्याशी आलोक मिश्रा का चुनाव गति नहीं पकड पा रहा है। कार्यकर्ताओं में उत्साह नहीं है और प्रचार प्रसार के लिए जोशीले कार्यकर्ताओं की कमी है। कांग्रेस और सपा से जुडे कुछ पदाधिकारी तो यहां तक कह रहे हैं कि बिजनेस माइंडेड आलोक मिश्रा कुछ चंद लोगों से घिरे हुए हैं। जिससे उनकी नैय्या पार होने की बजाय डूबती नजर आ रही है।
उत्तर भारत के मैनचेस्टर सिटी के रूप में पहचाने जाने वाले कानपुर एक समय कांग्रेस का सबसे बडा गढ था। यह शहर मजदूरों का शहर भी कहा जाता है, यहां की दर्जनों मिलें देश से लेकर विदेश तक मशहूर रहीं। पूर्ववर्ती सरकारों की अनदेखी के कारण मजदूरों और कामगरों का कांग्रेस से मोह भंग होता गया। कांग्रेस से श्रीप्रकाश जायसवाल लंबे से समय तक कें्रदीय मंत्री तक रहे लेकिन इसके बाद से लगातार कांग्रेस रसातल में जाती गई। कांग्रेस से जुडे पदाधिकारी कहते हैं कि जिले लेकर से वार्ड स्तर तक कमेटियां सक्रिय नहीं है। इसके पीछे राज्य का नेतृत्व भी दिशाहीन है। बीते माह दक्षिण शहर के प्रभावशाली नेता अजय कपूर ने हजारों कार्यकर्ताओं के साथ बीजेपी का दामन थाम लिया। इसके बाद कांग्रेस कानपुर में पूरी तरह से घुटनों पर आ गई है। इस बार के लोकसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस सहित अन्य दलों के गठबंधन प्रत्याशी आलोक मिश्रा मैदान में है लेकिन चुनावी हालात में कोई बदलाव नहीं है। शहर में आलोक मिश्रा के चुनाव में जोश और गति की बेहद कमी है। सिर्फ चुनाव कार्यालय को छोडकर कहीं पर नाम तक नहीं दिखता है। इसकी वजह से लोग कनेक्ट नहीं हो पा रहे हैं।
पैसे के दम पर चुनाव लड रहे आलोक मिश्रा ?
कहा जाता है कि चुनाव कार्यकर्ताओं के दम पर लडा जाता है लेकिन कानपुर में कांग्रेस प्रत्याशी आलोक मिश्रा के लिए राजनीतिक लोग कहते हैं कि वह पैसे के दम पर चुनाव लड रहे हैं। पेड वर्करों की फौज के सहारे चुनाव का माहौन बना रहे हैं लेकिन शाम होते ही ठंडा हो जाता है। कुछ लोग उनके चुनाव का मैनेजमेंट देख रहे हैं वह अपना कल्याण करने में जुटे हुए हैं। बताया गया कि आलोक मिश्रा की पत्नी वंदना मिश्रा मेयर का चुनाव लड चुकी हैं। उनको अच्छे वोट हासिल हुए थे लेकिन मेयर और केंद्रीय चुनाव में बडा फर्क होता। लोकसभा में वोट केंद्रीय नेतृत्व के आधार पर मिलता है। कांग्रेस का नेतृत्व खुद ग्लोकूज मांग रहा है।