Thursday, April 3, 2025
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कानपुर देहात: 43 साल बाद भी नहीं बन सका उर्वरक भंडारण गृह


ख़ास खबर…

जनपद के माननीयो ने नहीं की पहल, सिर्फ कोरे वायदे

कानपुर नगर में होता है जिले की खाद का भंडारण

शंकर सिंह, स्वराज इंडिया
कानपुर देहात।
कानपुर नगर से 1981 में विभाजित होकर अलग जिला बने भले ही 43 साल हो गए हो लेकिन जनपद में चार सांसद होने के बाद भी कानपुर देहात की जनता को आज भी कई सुविधाओं के लिए पड़ोसी जनपद का मुंह देखना पड़ता है। क्योंकि माननीयों ने कभी पहल ही नही की। कृषि प्रधान जिला होने के बाद भी यहां उर्वरक भंडारण के लिए अपना बफर गोदाम नहीं बन सका है। जिससे यहां के किसान पड़ोसी जनपद पर आश्रित रहते हैं वहां की जरूरत पूरी होने के बाद ही जिले को खाद मिलती है। बफर गोदाम का प्रस्ताव बनाया गया, जमीन चिंहित हुई, रैक प्वाइंट के लिए मलासा रेलवे स्टेशन को चिह्नित किया गया है लेकिन माननीयों के रुचि न लेने पर फाइल ठंडे बस्ते में चली गई।
कानपुर देहात जिले की अधिकतर आबादी कृषि पर आश्रित है । यहां छोटे बड़े मिलाकर करीब चार लाख काश्तकार हैं। कानपुर नगर से जिले का पहली बार विभाजन 9 जून 1976 में हुआ था और कानपुर देहात जिला बनाया गया था। इसके बाद यहां स्थायी मुख्यालय न होने की वजह से 12 जुलाई 1977 में इस विभाजन को खत्म करके फिर से एक जिला कानपुर नगर कर दिया गया था। कानपुर नगर का क्षेत्रफल बड़ा होने की वजह से ग्रामीण क्षेत्रों में विकास की रफ्तार सुस्त होने पर एक बार फिर इस जिले के गठन की जरूरत समझी गई तब 23 मई 1981 को दोबारा विभाजन करके जिला बनाया गया। लेकिन अब तक जिले को कई सुविधाओं के लिए कानपुर नगर पर ही आश्रित रहना पड़ता है। कृषि पर आश्रित होने के बाद भी अभी तक जिले में उर्वरक भंडारण के लिए अपना बफर गोदाम (उर्वरक भंडारण गृह) नहीं बन सका। जिससे प्रत्येक वर्ष यूरिया व डीएपी के खत्म होने की समस्या आती है और कानपुर नगर के गोदाम की ओर यहां के किसानों को देखना पड़ता है। इस जिले की खाद का भी भंडारण कानपुर नगर में होता है। रबी की बुआई के समय खाद की मारामारी होती है तब समय से जिले को खाद नहीं मिल पाती है। स्वाभाविक बात है कि वहां के अधिकारी पहले अपने जिले की जरूरत पूरी करते हैं इसके बाद यहां के लिए खाद भेजते हैं।

बफर गोदाम के लिए 2017 में बना था प्रस्ताव

इस समस्या को देखते हुए 2017 में जिले में खाद बफर गोदाम बनाए जाने के लिए पीसीएफ ने प्रस्ताव बनाया था। इसके लिए अकबरपुर तहसील के रूरा मार्ग पर जमीन एक एकड़ जमीन चिह्नित की गई थी और मलासा रेलवे स्टेशन को रैक प्वाइंट बनाने के लिए पीसीएफ व रेलवे के अधिकारियों ने प्रस्ताव तैयार कर उच्चाधिकारियों के पास भेजा था। माननीयों ने इस गंभीर मसले पर रूचि नहीं ली जिससे यह प्रस्ताव रेलवे में अटक गया। वहीं पीसीएफ को जमीन का आवंटन भी नहीं किया जा सका। इससे बफर गोदाम बनाने का यह बड़ा मुद्दा फिर अटक गया।

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