रूरा -शिवली रोड के उत्तर दिशा में लगभग ३ किलोमीटर दूर ग्राम लम्हरा में रिन्द नदी के दाएं तट पर स्थित है
स्थानिय लोगों के मुताबिक़ परहुल देवी और महादेव की स्थापना १२ वीं शताव्दी में परहुल के राजा सिंघा ने की थी
स्वराज इंडिया न्यूज ब्यूरो
कानपुर देहात।
परहुल देवी मंदिर यह मंदिर उत्तर प्रदेश में कानपुर देहात जिले के रूरा -शिवली रोड के उत्तर दिशा में लगभग ३ किलोमीटर दूर ग्राम लम्हरा में रिन्द नदी के दाएं तट पर स्थित है।परहुल देवी मंदिरयह मंदिर उत्तर प्रदेश में कानपुर देहात जिले के रूरा -शिवली रोड के उत्तर दिशा में लगभग ३ किलोमीटर दूर ग्राम लम्हरा में रिन्द नदी के दाएं तट पर स्थित हैयह मंदिर आल्हा -उदल के समय भी था। इससे मंदिर की प्राचीनता का पता चलता है। परमाल रासो (आल्हा ) में इस मंदिर उल्लेख मिलता है।[
इस मंदिर का निकटतम रेलवे स्टेशन रूरा है। रेलवे स्टेशन रूरा से लगभग 9 किलोमीटर दूर उत्तर- पूर्व में रूरा -शिवली रोड के निकट ग्राम लम्हारा में रिन्द नदी के दाएं तट पर स्थित है। रूरा से बस या टेम्पो से यहां पंहुचा जा सकता है।शिवली से इस मंदिर की दूरी 14 किलोमीटर है। रूरा -शिवली रोड से उत्तर दिशा में 1.2 किलोमीटर रिन्द नदी के दाहिने तट पर स्थित है। रूरा से जाने पर रिन्द नदी के पहले बायीं ओर पक्का संपर्क मार्ग है।

मंदिर परिसर में परहुल देवी और महादेव की स्थापना १२ वीं शताव्दी में परहुल के राजा सिंघा ने की थी। आल्ह खंड (परमाल रासो ) में निम्न पंक्ति का उल्लेख मिलता है।
लाल भगत का मुर्गा मारो ,परहुल दिया बुझायो जाय।।वीर योद्धा आल्हा ने विजय कामना की दृष्टि से इस मंदिर में सोने का ज्योति कुंड बनवाया था। इस कुंड में जलने वाली ज्योति का प्रकाश कन्नौज के राजमहल तक पहुचता था। इसके प्रकाश से रानी पद्मावती की नींद में विघ्न पड़ता था फलस्वरूप उदल ने इस ज्योति कुंड को रिन्द नदी में फेंक दिया था।
परहुल देवीइस मंदिर का निर्माण १२ वीं शताव्दी में हुआ था। मंदिर के मुख्य भवन में उत्तरी सिरे पर बने गुम्बद के नीचे माता परहुल देवी विराजमान हैं.5 फ़ीट ऊँचे और लगभग १.५ फ़ीट चौड़ी शिला के निचले सिरे पर माता परहुल देवी (काली देवी ) की तीन मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। ये तीनों मूर्तियां भाव पूर्ण मुद्रा में हैं जो दर्शकों को मोहित करने वाली हैं। मूर्तियां जिस शैली में उत्कीर्ण हैं उससे इनकी प्राचीनता का पता लगता है। इस मंदिर में प्रवेश के लिए रिन्द नदी के तट की ओर सीढ़ियां बनी हुयी है।
महादेव मंदिर परिसर में ही दक्षिण दिशा की ओर स्थित दूसरे गुम्बद के नीचे देवोँ के देव महादेव विराजमान हैं। इस मंदिर में भगवान् भोलेनाथ का भव्य शिव लिंग स्थापित है। इस मंदिर में प्रवेश के लिए दक्षिण दिशा में बनी सीढ़ियों से प्रवेश करते है।रिंद नदी किनारे स्थित इस विख्यात मंदिर की जीवंत दास्तां है। सदी पूर्व आल्हा ऊदल काल की कुछ किस्से इस मंदिर से जुड़े हुए हैं। यहां की मान्यता है कि यहां आकर मांगने वाले कि सारी मुरादें पूरी होती है। इसी मान्यता के चलते आल्हा ने भी युद्ध में करिंगा से जीत हासिल करने के लिए यहां कई किलो सोने का हवन कुंड बनवाया था और ज्योति जलाकर विजयी होने की कामना की थी, जो पूरी हुई थी। तभी से इस मंदिर से लोगों की आस्था जुड़ गई और दूर दराज से लोग आने लगे।

कन्नौज के राजमहल तक जाती थी रोशनी यह मंदिर आल्हा काल की याद दिलाता है। नवरात्रि के पर्व में अष्टमी के दिन यहां श्रद्धालुओं का तांता लगता है। दूर दराज जनपदों व दूसरे राज्यों से लोग यहां मन्नते मांगने आते है। बताया जाता है कि वीर योद्धा आल्हा ने विजय कामना के लिये मंदिर मे सोने का ज्योति कुंड बनवाया था। जिसमें अखंड ज्योति जलाई थी। उस ज्योति की रोशनी इतनी तेज थी कि जनपद कन्नौज के राजमहल तक जाती थी। जिससे रात के समय कन्नौज की महारानी पदमा के निद्रा में खलल पड़ती थी। इससे तंग आकर महारानी ने ऊदल को इस हवन कुंड ज्योति को बुझाने का आदेश दिया था। महारानी के हुक्म के अनुसार ऊदल ने हवन कुंड बुझाकर उसे रिन्द नदी में फेंक दिया था
इतिहास से जुड़ा है यह मंदिर
महोबा के राजा परमाल थे। जिनके राज्य मे दो सेनापति दक्षराज व वक्षराज थे। दक्षराज के दो पुत्र आल्हा व ऊदल थे। वहीं वक्षराज के दो पुत्र सुलखान व मलखान थे। उस समय मांडा के राजा जम्बे ने महोबा पर चढाई कर दी। जिसमे एक विशाल युद्ध हुआ। युद्ध मे दक्षराज मारे गये थे। उस समय दक्षराज की पत्नी के गर्भ मे ऊदल पल रहे थे। ऊदल का जन्म होने के बाद जब वह 11 वर्ष के हुये तो उन्होने मांडवा राज्य पर हमला बोल दिया। उस समय मांडवा का राजा जम्बे का पुत्र करिंगा था। उसी समय युद्ध मे विजय हासिल करने के लिये आल्हा ने इस परहुल देवी के मंदिर मे जाकर सोने का ज्योति कुंड बनवाया और अखंड ज्योति जलाई थी।