Friday, April 4, 2025
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कानपुर देहात : डीजे के शोर में विलुप्त हो गई गांवों में फाग गायन

आठ दिन पहले से शुरू हो जाती थी फाग

अब गांवों में वो स्थानीय परंपराएं धीरे धीरे खत्म सी होती जा रही हैं

आपसी विवाद और मनमुटाव भी बड़े कारण, मोबाइल फोन से खत्म हुए मिलन समारोह

शंकर सिंह, स्वराज इंडिया
कानपुर देहात

ढोलक की थाप, मंजीरे की खनक के बीच दमदार आवाज में फाग के राग अधिकतर गांवों में अपनी पहचान खोते जा रहे हैं। कभी गांव के चौखटों पर होली के आठ दिन पहले फाग का आयोजन लोगों की शान का प्रतीक हुआ करता था। जो अब समय के साथ धीरे-धीरे अपनी पहचान खोता जा रहा है। होली पर फागियों की मस्ती अब डीजे के शोर में गुम होती जा रही है। हालांकि अभी भी कुछ गांवों के बुजुर्गों ने अभी भी इस विरासत को संजो कर रखा है लेकिन उम्र के आखिरी ढलान पर ढोलक पर पड़ने वाले कांपते हाथों को अब युवा पीढी का सहारा मिलना बंद हो चुका है। गांवों में होली पर कई दिन पहले शुरू हो जाने वाले परंपरागत फाग अब अपनी पहचान खोते जा रहे हैं।
युवाओं में इस पुरानी विधा को सीखने की न तो ललक बची है और न वो इस विधा को सीखने में अपनी रूचि दिखा रहे है।होली के दौरान ढोलक की थाप, मंजीरे की खनक और झींका की आवाज जिसके दरवाजे पर बजती थी तो आसपास के लोग खिंचे चले आते थे। अब अधिकतर गांवों में होली मनाने के तौर तरीकों में भी अंतर आया है। अधिकतर युवा डीजे की तेज आवाज में नए गानों की धुन सुनना पसंद करते हैं। जिसकी वजह से सालों से चली आ रही परंपरा अपनी पहचान खो रही है।

अब तो रह गई सिर्फ यादें…

डीघ गांव के 90 वर्षीय राधा कृष्ण पांडेय ने बताया कि हमारे जमाने में होलिका दहन के पहले से फाग गायन शुरू हो जाता था । लोग भारी संख्या में सभी काम निपटा कर शामिल होते थे। जिससे पता चल जाता था की होली आने वाली है। बाद होली खेलना शुरू हो जाता था, पांच दिन तक यह त्योहार बड़े धूमधाम से मनाया जाता था। पहले दिन होली कीचड़, गोबर के साथ खेली जाती थी, सभी वर्गों के लोग एक साथ मंडली बनाकर होली खेला करते थे, एक दूसरे को इतना रंग लगाते थे, कि उसका चेहरा तक भी पहचानना मुश्किल था। फांगे गवती थी, भांग बनाकर पिया करते थे, अब वो मान्यता नही रह गई हमारे जमाने में लोग एक दूसरे को रंग लगाकर गले मिलते थे। अपने से बड़े के पैर छू‌कर आशीर्वाद लेते थे अब अगर किसी को रंग लगा दे वह लड़ाई करने के तैयार हो जाता है, पहले होली के एक सप्ताह पहले से घरों की महिलाएं गुझियां, पपड़ियां, बनाना शुरु करते थे, जब कोई मेहमान व गांव के लोग आते थे।

गुलाल और फूलों से खेलेंगे होली

युवा शिवम तिवारी ने बताया कि होली का त्योहार मनाने का तरीका बदलता जा रहा है। जिससे होली का त्योहार फीका पड़ रहा है। कहते हैं कि हम युवाओं की मंडली बनाकर इस साल बिना केमिकल रंगों के होली मनाएंगे, हम बिना केमिकल का गुलाल और फूलों के साथ अपने दोस्तों के साथ होली मनाएंगे, और बाजारों की मिठाइयां अपने घर में नहीं लाएंगे, सिर्फ घर में मिठाइयां बनवाकर उनका ही सेवन करेंगे। आज के युवा होली का त्योहार पार्टी की तरह बनाने लगे हैं। उसमें सिर्फ युवा पीढ़ी शामिल हो, मगर हम अपने दौस्तों और परिवार के लोगों के साथ यह पर्व बड़े धूमधाम से मनाएंगे।

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