
आज के डिजिटल युग में, जहाँ सूचना तेजी से फैल रही है और हर किसी के पास अपने विचार व्यक्त करने का एक मंच है, वहीं परम्परागत अखबारी माध्यमों की स्थिति कुछ चिन्ताजनक हो गई है। इन चिन्ताओं में से एक प्रमुख मुद्दा छोटे वर्ग के अखबारों के अस्तित्व का संकट है। ऐसे अखबार, जो सीमित संसाधनों के बावजूद समाज के विभिन्न हिस्सों की आवाज बनते हैं, धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं। इसके पीछे एक बड़ी वजह केन्द्र की मोदी सरकार की कुत्सित नीतियाँ, बाजार की ताकतें और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की तेजी से बढ़ती पहुंच है।
कई बार यह देखा गया है कि बड़े वर्ग के अखबारों के बड़े घराने अपने संसाधनों के बल पर छोटे वर्ग के अखबारों को दबाने की कोशिश करते हैं। तो अप्रत्यक्ष रूप से केन्द्र की मोदी सरकार भी उनका समर्थन करती दिख रही है, क्या यह सही है? क्या यह केवल छोटे वर्ग के अखबारों का अन्त करने के लिए किया जा रहा है, या फिर मोदी सरकार द्वारा ऐसी कुत्सित नीतियाँ तैयार की जा रहीं हैं जो भविष्य में छोटे वर्ग के अखबारों को ही नहीं अपितु अखबारी जगत की ही विविधता को खत्म कर देंगी ?
छोटे वर्ग के अखबारों का समाज में एक महत्वपूर्ण स्थान होता है। ये अखबार स्थानीय मुद्दों, सटीक खबरों और आम लोगों की समस्याओं को प्रमुखता से उठाते हैं। वे न केवल राष्ट्रीय और वैश्विक समाचारों को छापते हैं, बल्कि समाज के छोटे से छोटे तबकों की आवाज भी बनते हैं। यही नहीं, ये अखबार उन स्थानों पर अपनी छाप छोड़ते हैं जहाँ बड़े वर्ग के अखबार अपनी पहुंच नहीं बना पाते।
जब छोटे अखबारों की बात होती है, तो यह केवल उनकी आवाज नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व से जुड़ी एक बड़ी संस्कृति और धरोहर का सवाल होता है। ये अखबार न केवल समाज की जागरूकता बढ़ाते हैं, बल्कि एक समृद्ध लोकतंत्र के निर्माण में भी अहम भूमिका निभाते हैं।

छोटे वर्ग के अखबारों का महत्व
क्या बड़े अखबारी घराने व मोदी सरकार की कुत्सित नीतियाँ, छोटे अखबारों के लिए खतरा बन चुकी हैं ?
बड़े वर्ग के अखबारों के पास विशाल संसाधन और तकनीकी क्षमता होती है, जिससे वे बहुत ही प्रभावी तरीके से समाचारों को प्रस्तुत कर सकते हैं। ऐसे में छोटे अखबारों के लिए प्रतिस्पर्धा करना और अपनी जगह बनाए रखना मुश्किल हो जाता है। जब बड़े वर्ग के अखबार, केवल अपने लाभ और उद्देश्य को ध्यान में रखते हैं, तो छोटे अखबारों के अस्तित्व को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
इसके अलावा, मोदी सरकार की अनेक कुत्सित नीतियाँ भी छोटे वर्ग के अखबारों के लिए समस्याएँ पैदा करती दिख रहीं हैं। सरकारी विज्ञापन, सरकारी सहायता और अन्य वित्तीय मुद्दे छोटे अखबारों के लिए बाधा बनते रहते हैं। जो कि मोदी सरकार आते ही छोटे वर्ग के अखबारों के लिये बन्द कर दिये गये हैं। परिणामस्वरूप, इन अखबारों की गुणवत्ता प्रभावित होती जा रही है, और वे धीरे-धीरे बन्द होने की कगार पर हैं।
क्या कल बड़े अखबारों का भी यही हाल होगा?
हमारे सामने यह सवाल उठता है कि यदि छोटे अखबारों को खत्म करने की यह प्रवृत्ति जारी रही, तो क्या अगले चरण में मझोले या बड़े अखबारों की बारी भी नहीं आएगी ? जिस तरह से छोटे अखबारों को खत्म करने की योजनाएँ बनाई जा रही हैं, उसी तरह धीरे-धीरे मझोले अखबारों को भी निशाना बनाया जा सकता है। …और अगर यह प्रवृत्ति बनी रही, तो क्या हम भविष्य में केवल कुछ बड़े और प्रभावशाली अखबारों की एकरूपता के साथ रह जाएंगे?
यह सवाल हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम लोकतंत्र की उस विविधता को खो रहे हैं, जो समाज के हर वर्ग, हर तबके की आवाज को महत्त्व देती है।
निष्कर्ष: यदि हम चाहते हैं कि लोकतंत्र स्वस्थ और गतिशील बना रहे, तो हमें छोटे वर्ग के अखबारों को खत्म करने की नीतियों का पुरजोर विरोध करना होगा। यह केवल छोटे वर्ग के अखबारों के लिए नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग के लिए खतरे की घंटी है। समय आ गया है कि हम सभी मिलकर इस संकट का सामना करें और समाज में विभिन्न आवाजों के अस्तित्व को बनाए रखें। सिर्फ बड़े घरानों के बड़े वर्ग के अखबारों के नाम पर समाचारपत्रों का वर्चस्व नहीं होना चाहिए; हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि सभी वर्गों की आवाज को सुना जाए। ऐसा नहीं तो आज छोटे वर्ग के अखबारों को खत्म करने का कुत्सित जतन (उपाय) सोंचा गया है। कल मझोले वर्ग के अखबारों का नम्बर आएगा, और परसों… बड़े वर्ग अखबारों के अखबारों का नम्बर आयेगा या हो सकता है कि बड़े वर्ग के अखबार, दरबारी या गुलामों की भूमिका को निभाने के लिये मजबूर कर दिया जाये !
-श्याम सिंह ‘पंवार’
कानपुर।
(लेखक, भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य रहे हैं और एसोसिएशन ऑफ स्मॉल एण्ड मीडियम न्यूजपेपर्स ऑफ इण्डिया के उप्र राज्य इकाई के अध्यक्ष हैं।)