बीजेपी प्रत्याशी लल्लू सिंह को अयोध्या से हैट्रिक का इंतजार, राम मंदिर निर्माण के बाद पूरी दुनिया में बदल गई अयोध्या की तस्वीर
कुँवर समीर शाही,स्वराज इंडिया
अयोध्या।
उत्तर प्रदेश में सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी एक बार फिर लोकसभा चुनाव में यहां पर अच्छा प्रदर्शन करने की जुगत में है, तो वहीं विपक्षी गठबंधन भी अपने प्रदर्शन में और सुधार करना चाहता है। भगवान श्रीराम की जन्मस्थली अयोध्या में 22 जनवरी को भव्य प्राण प्रतिष्ठा के बाद न सिर्फ जिले की फैजाबाद संसदीय सीट पर सियासी हवा बदल गई है बल्कि पूरे यूपी में भी माहौल बना हुआ है। फैजाबाद सीट पर 2019 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के लल्लू सिंह को जीत मिली थी। पिछले 10 साल से बीजेपी का यहां पर दबदबा बना हुआ है।
हालांकि इस समय अयोध्या भी राम के रंग में रंगी हुई है। जिले का नाम भी बदलकर अयोध्या कर दिया गया है लेकिन लोकसभा सीट अब भी फैजाबाद ही है। यहां की सियासत की बात करें तो अयोध्या भी राम मंदिर मुद्दे की भावनाओं में डूबती-उतराती रही है। भाजपा का खाता यहां राम लहर में ही खुला था। इस मुद्दे के साथ ही अयोध्या के विकास का मुद्दा और यहां के जातीय समीकरण भी सियासत की दिशा तय करते रहे हैं। यही वजह है कि राम मंदिर की लहर के बाद भी यहां सपा और बसपा जीतने में सफल रही हैं। यूं तो यहां कम्युनिस्ट पार्टी भी खाता खोल चुकी है लेकिन सबसे ज्यादा सात बार कांग्रेस ही जीती है। उसके बाद भाजपा यहां से पांच बार जीत दर्ज कर चुकी है।
इमरजेंसी के बाद टूटा कांग्रेस का तिलिस्म
फैजाबाद सीट पर पहला चुनाव 1957 में हुआ। तब से लगातार चार बार इस सीट पर कांग्रेस का कब्जा रहा। पहले चुनाव में स्वतंत्रता सेनानी कांग्रेस के राजाराम मिश्र ने जीत दर्ज की। दूसरे चुनाव में बृजवासी लाल को टिकट दिया गया। वह भी जीत गए। उसके बाद 1967 और 1971 में स्वतंत्रता सेनानी राम कृष्ण सिन्हा कांग्रेस से लगातार दो बार चुनाव जीते। इमरजेंसी के बाद पहली बार यहां हवा का रुख बदला। जनता पार्टी के अनंतराम जायसवाल सांसद चुने गए। हालांकि 1980 में एक बार फिर कांग्रेस ने वापसी की। जय राम वर्मा सांसद चुने गए। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए 1984 के चुनाव में भी कांग्रेस के निर्मल खत्री ने चुनाव जीता। उसके बाद कांग्रेस के खिलाफ सभी पार्टियां एकजुट हुईं और पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह के नेतृत्व में मोर्चा बना तो फिर फैजाबाद सीट पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी भी जीत दर्ज करने में सफल रही। यहां से मित्रसेन यादव सांसद चुने गए।
राम मंदिर लहर में भाजपा की दस्तक
1991 में जब चुनाव हुआ तो पूरे देश में राम मंदिर की लहर थी। उसी लहर में पहली बार भाजपा ने फैजाबाद सीट पर पहली जीत दर्ज की। मंदिर आंदोलन के फायर ब्रैंड नेताओं में से एक विनय कटियार यहां से सांसद बने। वह लगातार दूसरी बार 1996 का चुनाव भी जीतने में सफल रहे। उसके बाद से यहां फिर जातीय गुणा-गणित की लड़ाई शुरू हुई। ऐसे में 1998 का चुनाव मित्रसेन यादव ने सपा के टिकट से जीत लिया। अगले ही साल 1999 में हुए लोकसभा चुनाव में फिर से विनय कटियार ने जीत हासिल की। बदलाव का यह दौर चलता रहा। मित्रसेन यादव 2004 में बसपा के टिकट पर चुनाव जीतकर सांसद बने। वहीं 2009 में कांग्रेस के निर्मल खत्री जीते। उसके बाद 2014 और 2019 में लगातार भाजपा ने जीत दर्ज की और दोनों बार लल्लू सिंह सांसद बने।
मंदिर और विकास अहम मुद्दा
बात फैजाबाद सीट के चुनावी मुद्दों की करें तो यहां पर राम मंदिर के साथ ही अयोध्या और आसपास का विकास अहम मुद्दा रहा है। वर्षों से इस पर राजनीति तो होती रही और सरकारें बनती-बिगड़ती रहीं लेकिन अयोध्या नहीं बदली। इस विकास के नाम पर भी राजनीति हुई लेकिन बदलाव नहीं हुआ। अब राम मंदिर बनने के बाद यह एक बार फिर से बड़ा मुद्दा है। मंदिर के साथ ही सरकार ने जो और योजनाएं शुरू की हैं, उससे लोगों को उम्मीद जागी है। अयोध्या और आसपास पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए काम किए जा रहे हैं। हवाई अड्डा शुरू हो चुका है। नई अयोध्या बस रही है। कई बड़े हाउसिंग प्रॉजेक्ट और होटलों का निर्माण के लिए सैकड़ों प्रस्ताव आए हैं। घाटों की मरम्मत और उसका सौंदर्यीकरण किया जा रहा है।
ओबीसी वोटरों पर सबकी नजर
मंदिर और विकास के साथ ही यहां जीत के लिए जातीय समीकरण बहुत अहम हैं। यहां करीब 1.50 लाख मुस्लिम वोटर हैं। हिंदू वोटरों में सबसे ज्यादा 7.20 लाख ओबीसी वोटर हैं। इनमें भी सबसे ज्यादा यादव हैं। उसके बाद फिर कुर्मी, पाल सहित कई जातियां हैं। एससी वोटरों की संख्या 4.70 लाख है तो सामान्य वोटर भी कम नहीं हैं। इनकी संख्या 5.65 लाख है। ऐसे में ओबीसी वोटरों की संख्या ज्यादा होने के कारण उन पर सभी दलों की खास निगाह रहती है। फैजाबाद सीट में पांच विधान सभाएं हैं। इनमें से अयोध्या, रुदौली, मिल्कीपुर और बीकापुर फैजाबाद जिले में आती हैं। वहीं दरियाबाद बाराबंकी जिले में है। ऐसे में भौगोलिक दृष्टि से प्रत्याशियों के सामने वोटरों को साधने की चुनौती भी रहती है।
लल्लू को हैट्रिक का इंतजार
अयोध्या सीट पर भाजपा 1991 से जीत का स्वाद तो चखती रही है। दो बार ऐसे मौके आए हैं, जब वह लगातार दो बार जीत दर्ज कर चुकी है लेकिन अभी तक हैटट्रिक नहीं लगा सकी है। इससे 1991 और 1996 में लगातार दो बार विनय कटियार जीते थे। अब लल्लू सिंह लगातार दो बार जीत चुके हैं। इस बार भी लल्लू सिंह प्रत्याशी हैं। अब देखना ये है कि वह भाजपा के लिए हैटट्रिक लगा पाते हैं या नहीं। उनके मुकाबले सपा ने दलित चेहरे अवधेश प्रसाद पर दांव लगाया है। वह पुराने सपा नेता हैं और फैजाबाद की अलग-अलग सीटों से कई बार विधान सभा चुनाव जीत चुके हैं। ऐसे में सपा ने वहां दलित और ओबीसी समीकरण साधने की कोशिश की है। वहीं बसपा ने सच्चिदानंद पांडेय सचिन को बतौर लोकसभा प्रभारी सवर्ण चेहरे के तौर पर पेश किया है। इस तरह बसपा ने सवर्ण और दलित समीकरण साधने की कोशिश की है। अब देखना ये है कि राम मंदिर मुद्दे पर ये जातीय गुणा-गणित कितना असर डालते हैं।