Friday, April 4, 2025
Homee-paperडा.आम्बेडकर के जीवन से कितनी ली सीख ?

डा.आम्बेडकर के जीवन से कितनी ली सीख ?

श्याम सिंह पंवार संपादक एवं सदस्य, प्रेसकाउंसिल ऑफ इंडिया

भारत के संविधान निर्माता के रूप में बाबा साहेब डॉ0 भीमराव आम्बेडकर की 133वीं जयंती मनाई जा रही है। डॉ0 आम्बेडकर के जीवन दर्शन पर प्रकाश डालने वाले बड़े-बड़े भाषण दिये गये।
इस में कतई दो राय नहीं कि डॉ0 आम्बेडकर के द्वारा भारतीय संविधान के निर्माण में किये गये अमूल्य व अतुलनीय योगदान को भुलाया या झुठलाया नहीं जा सकता! डॉ0 आम्बेडकर ने दलित व शोषित समाज के लिए महत्वपूर्ण अनेक कदम उठाए।
अछूतों (दलितों) से सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध अभियान चलाया था और सामाजिक विषमता को मिटाने के लिये बौद्ध आंदोलन के लिये लोगों को प्रेरित किया। श्रमिकों, किसानों और महिलाओं के अधिकारों का समर्थन किया। डॉ0 आम्बेडकर के समक्ष सामाजिक भेदभाव आदि अनेक विषम व जटिल परिस्थितियां आईं और उन्होंने उनका सामना किया लेकिन उनके सामने हार नहीं मानी।
आज देश को आजादी मिले लगभग 7 दशक हो चुके हैं। इतना समय गुजरने के बाद डॉ0 आम्बेडकर की जयन्ती पर हर बार सामाजिक विषमताओं की बुराई करने वाला क्या दलित समाज स्वयं में सामाजिक विषमताओं से मुक्ति पा सका है ? इसके आलावा उन महान बुद्धजीवियों से सवाल है जिन्होंने जातीय भेदभाव को समूल नष्ट करने हेतु ‘जाति तोड़ो, समाज जोड़ो’ का नारा देकर अनेक पुस्तकों की रचना कर डाली, क्या वो जाति व्यवस्था से अपने को मुक्त कर पाये ?
जवाब है, कतई नहीं।
उन्होंने सिर्फ जाति ‘तोड़ो समाज जोड़ों’ की रचना तो की लेकिन एक लेखक के रूप में जब नाम छपने की बारी आई तो अपने नाम के सामने से अपनी जाति लिखने का मोह नहीं छोड़ा। जो लोग आज भी जाति तोड़ो समाज जोड़ो का नारा बड़ी बड़ी सभाओं में लगाते हैं और लगवाते हैं, क्या उन्होंने अपने नाम के साथ अपनी जाति लिखना छोड़ा ?
क्यों ??? जिन कार्यक्रमों में वक्तागण, सामाजिक विषमता की निन्दा करते हैं, लम्बे चौड़े भाषण देते हैं। उन्हीं कार्यक्रमों में चाहे आयोजक हों या मुख्य अतिथि, उनके नाम के आगे जाति लिखना क्यों छोड़ते ???
अनेक सभाओं में बड़े बड़े भाषण देने वाले विद्वानों के मुंह से जब उनके शब्द निकलते हैं तो उनके निशाने पर होता है सवर्ण अर्थात ठाकुर, ब्राम्हण, बनिया…. आदि ! उनके भाषणों से साफ झलकता है कि समाज में भेदभाव के लिये सीधे तौर पर वो सवर्ण जातियाँ ही जिम्मेदार हैं।
ऐसे आज सवाल सीधा उन्हीं से है जो लोग सामाजिक भेदभाव या विषमता के लिये सीधे तौर सवर्ण अर्थात ठाकुर, ब्राम्हण, बनिया…. आदि को जिम्मेदार मानते हैं? क्या वो अपने ही वर्ग में सामाजिक भेदभाव मिटा पाये ??
कटु सत्य है कि हर वर्ष डॉ0 आम्बेडकर जयन्ती मनाने, समाज से भेदभाव मिटाने की कसम खाने के बावजूद आप आज तक अपने ही समुदाय अर्थात वर्ग जिसे अनुसूचित वर्ग कहा गया, उसके अन्तर्गत आने वाली उन्हीं जातियों के लोग आपस में शादी-विवाह, खानापान आदि में सामाजिक भेदभाव अर्थात विषमता को नहीं मिटा सके।
सवाल यह भी है कि, बाल्मीकि जाति से संखवार जाति के लोग, धानुक जाति के लोग कुरील जाति के परिवारों से शादी सम्बन्ध क्यों नहीं तय करते हैं ? क्यों नहीं कुर्मी जाति के लोग अहीर या गड़रिया जाति के परिवार से शादी सम्बन्ध तय करते हैं ? क्यों नहीं कुर्मी, अहीर, गड़रिया जाति के लोग बाल्मीकि परिवार में शादी सम्बन्ध तय करते हैं? इसके लिये किसने मना किया आपको, ठाकुरों ने …..??????
आज भी आंकलन करें तो निष्कर्ष यही निकलता है कि शिक्षित और समर्थ होने के बावजूद खुद में सुधरना नहीं चाहते और दूसरों पर दोषारोपण करते रहते हैं!! आप लोग स्वयं ही डॉ0 आम्बेडकर के स्वप्न को साकार करने की बड़ी बाधा हो।
सामाजिक विषमता के लिये सवर्णो को कोसने वालो, पानी पी पी कर गाली देने वालो, पहले अपने मन के अन्दर झांको फिर सवर्णो को जी भर कर गाली दो।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Recent Comments

error: Content is protected !!