डाॅ. ज्योति दिलारे, चिकित्सक एवं विचारक
“एक लड़की की शिक्षा समाज में बहुत कुछ बदल देती है। सदियों की रूढ़िवादी व्यवस्था जो मानवीयता में भेद करती हैं उन्हें तोड़ देती है। गरीबी की बेङियों से खुद को आजाद करती है, समाज में आत्मबल की ज्योति जलाती है। थल से आकाश तक, धरती से पाताल तक, चारों दिशाओं में ज्ञान की रौशनी बिखेर कर समाज उज्ज्वलित करती है और हक-हकूक की जंग लङकर जीतती है।”
डाॅ. ज्योति दिलारेचिकित्सक एवं विचारक
आधी आबादी यानी महिलाओं की शिक्षा असल मायने में समाज के बड़े सकारात्मक बदलाव का आधार बनती है। यह बदलाव समाज के हर स्तर पर देखने को मिलता है। देश के उज्जवल भविष्य के साथ गरीबी से मुक्ति, कुरीतियों से दूर, हमारे आने वाली पीढ़ी के भविष्य के सुधार की रूपरेखा तय हो पाती है। मूलभूत सुविधाओं के साथ कुपोषण, उत्पीड़न-शोषण, बाल विवाह, भ्रष्टाचार,जैसे सामाजिक महत्वपूर्ण मुद्दों के समाधान की दिशा में एक शिक्षित लड़की के स्वस्थ, सुरक्षित जीवन और समाज के भविष्य को निर्धारित करने की अधिक संभावना होती है। लङकियों की शिक्षा के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं सही परवरिश और मार्गदर्शन, जिसके लिए माता-पिता का जिम्मेदारी पूर्वक निर्वहन किया गया कर्तव्य महत्वपूर्ण होता है।पारिवारिक शिक्षा के बाद स्कूली शिक्षा तो बच्चों के भविष्य की नींव होती है।आज शिक्षा या के साथ-साथ व्यवहारिक ज्ञान, नैतिक शिक्षा, सही और गलत की पहचान, साथ ही व्यावसायिक प्रशिक्षण भी आवश्यक है। शिक्षा के जरिए ही लङके तथा लङकियां दोनों ही अपनी व्यक्तिगत उन्नति करते हैं । जब भी माता-पिता अपने बच्चों से सवाल पूछते हैं कि आप बड़े होकर क्या बनाना चाहते हों, तो जबाव यही मिलता है- डाक्टर, इन्जीनियर, कलेक्टर, पायलट आदि। वहीं लङकियों के लिए आज भी दकियानूसी भरे भविष्य निर्धारण के फैसले थोपे जाते हैं। शिक्षा के महत्व पर आज भी भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में ध्यान नहीं दिया जाता। लङकियों की शिक्षा बहुत महत्वपूर्ण है। शिक्षा सम्मान, पद, प्रतिष्ठा और बहुत कुछ दिलाती है। “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओं” “पढेगा इंडिया, तभी तो बढेगा इण्डिया” जैसे श्लोगन से प्रोत्साहन जरूर मिलता है लेकिन जमीनी हकीकत भी जाननी होगी। यहां यह उल्लखित करना बेहद जरूरी है कि बहुत से कारणों के बीच गरीबी और दो जून की रोटी का जतन भी हमारे समाज में बच्चों की शिक्षा में बाधक है। इसके लिए सरकारों को गरीबी उन्मूलन के कार्यक्रमों के जमीनी स्तर पर सार्थक बनाए जाने के कङे यत्न किए जाने चाहिए। लङकियों की सामाजिक स्थिति लङकों की अपेक्षा उपेक्षित रही है । अतः वर्तमान में लङकियों की शिक्षा की आवश्यकता और भी अत्यधिक है, क्योंकि समाज में लङकियों के प्रति जो कुरीतियाँ और कुप्रथायें है उसकी समाप्ति शिक्षा के द्वारा ही हो सकती है । लैंगिक भेदभावों को दूर करने के लिए बालिकाओं की शिक्षा की प्रासंगिकता अत्यधिक है, क्योंकि शिक्षा के द्वारा ही इन भेदभावों को समाप्त कर समाज में समानता लाई जा सकती है । लोकतांत्रिक व्यवस्था में देश के सभी नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त है क्योंकि यहाँ पर शक्ति जनता में निहित होती है और यदि जनता अशिक्षित होगी तो लोकतंत्र सफल तथा सुदृढ़ कदापि नहीं हो सकता है।आधी आवादी यानी महिलाओं की शिक्षा असल मायने में समाज के बड़े सकारात्मक बदलाव का आधार बनती है। यह बदलाव समाज के हर स्तर पर देखने को मिलता है। ऐसे में लङकियों की शिक्षा की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है ।
भारत में लिंगानुपात में तीव्रता से अन्तर आ रहा है, परन्तु यदि शिक्षा का व्यापक रूप से प्रसार किया जाये तो साम्प्रदायिकता, लैंगिक भेदभाव, गरीबी इत्यादि समस्याओं का समाधान किया जा सकता है। शिक्षा की प्रासंगिकता इस प्रकार लङके तथा लङकियों दोनों के ही लिए है, क्योंकि दोनों ही समाज के अभिन्न अंग हैं।महान शख्सियतों ने कहा है कि एक लङकी शिक्षित होती है तो पूरा परिवार शिक्षित होता है। भारत की महान शख्सियतों के विचारों में नारी शक्ति भारत के संविधान निर्माता डॉक्टर अंबेडकर जी का भी सामाजिक तरक्की का आंकलन महिलाओं की शिक्षा और सुदृढ़ता की मजबूती के पैमाने से आंकते थे और वहीं ज्योतिबा राव फूले और सावित्रीबाई फूले, फातिमा शेख जैसी महान विभूतियों ने भी महिला शिक्षा को समाज की जरूरतों में शीर्ष पर रखा और इसके लिए दृढ संकल्पित होकर समाज में अगुवाकार बने। परिणामतः हम कह सकते है कि एक लड़की शिक्षित होने के बाद दुनिया के किसी भी कोने में अपनी चमक बिखेर सकती है और पूरे समाज को रौशन कर सकती है। समाज में परिवर्तन लाने के लिए, लङकियों को सशक्त बनाने के लिए, आत्मनिर्भर बनाने के लिए, बाहरी और आंतरिक समस्याओं के हल के लिए समाज में शैक्षिक दर बढ़ाने के लिए और अच्छे चरित्र के निर्माण के लिए, और समग्र मानवीय गुणों के विकास के लिए शिक्षा का बढ़ावा जरूरी है।
(यह लेखिका के निजी विचार हैं)