कन्नौज लोकसभा क्षेत्र की जनता और जिले के पार्टी नेतत्व के निर्णय पर आखिर अखिलेश को खुद उतरना पड़ा मैदान में
ढोल नगाड़ों और समर्थकों के हुजूम के जोश खरोस के बीच अखिलेश ने आखिर कन्नौज से दाखिल किया अपना नामांकन
सोशल मीडिया पर जहां चाचा शिवपाल ने विजय भव : सर्वदा लिखकर दिया आशीर्वाद, वहीं चाचा रामगोपाल प्रस्तावकों के साथ रहे नामांकन में मौजूद
नामांकन के बाद बोले अखिलेश, इस बार जनसहयोग से कन्नौज क्रांति होकर रहेगी और लिखा जायेगा नया इतिहास।
कन्नौज। संदीप शर्मा, स्वराज इंडिया
दरकते हुये गढ़ कन्नौज में एक बार फिर 12 साल बाद जान आती हुई नजर आने लगी है। समाजवादी पार्टी की कन्नौज से जीत कितनी मायने रखती है, ये यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बखूबी जानते हैं। तमाम आरोप प्रत्यारोप, राय, विचार विमर्श, के बाद आखिर अखिलेश ने चंद घंटों पूर्व घोषित प्रत्याशी और अपने भतीजे तेज प्रताप का कन्नौज से टिकट ही नहीं काटा बल्कि अपना निर्णय बदलते हुये खुद ही कन्नौज से लोकसभा का चुनाव लड़ने का फैसला किया।
अखिलेश जानते हैं कि, कन्नौज सीट पर सपा का प्रतिनिधित्व कायम रहना कितना महत्वपूर्ण हैं। उनका मानना है कि, पार्टी की कन्नौज से चुनावी जीत कन्नौज जिले की सभी 5 विधानसभाओं के अलावा औरैया, इटावा, मैनपुरी, फर्रुखाबाद, कानपुर देहात, हरदोई, जिले की सीटों पर भी अपना प्रभाव और गहरा असर डालती हैं।
आखिर प्रत्याशी तेज प्रताप का नाम घोषित किये जाने के बाद भी बीते 3 दिनों से जारी कसमकस और 40 दिनों के मंथन के बाद एक फैसला लिया गया। जिसमें अखिलेश यादव ही कन्नौज से चुनाव लडेंगे पर मोहर लगी।
नामांकन के अंतिम दिन गुरुवार को आखिर कन्नौज पहुंचे अखिलेश द्वारा नामांकन किये जाने की सूचना से जहां सपाइयों की बांछे खिल गई वहीं पार्टी और जनता में एक जोश सा नजर आने लगा।
आखिर वह पल आ ही गया जब अखिलेश यादव नामांकन को लेकर कन्नौज पहुंचे और पार्टी कार्यालय से चंद मिनट बाद ही दोपहर 12.30 बजे कलेक्ट्रेट मुख्यालय कन्नौज पहुंचे। इससे पूर्व
तिर्वा कन्नौज रोड स्थित पार्टी कार्यालय से ढोल नगाड़ों और जनसैलाब के बीच कलेक्ट्रेट गेट तक अखिलेश यादव को बधाई और शुभकामनाये देते हुये पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं से लेकर जनमानस भी थकता हुआ नजर नहीं आ रहा था। भीड़ तो प्रशासन की सख्ती से रोक दी गई, वहीं
दोपहर साढ़े 12 बजे अखिलेश कलेक्ट्रेट मुख्यालय पहुंचने के बाद अपने प्रस्तावकों के साथ अगले पांच मिनट में कलेक्ट्रेट स्थिति नामांकन कक्ष पहुंच गये।
12.39 बजे सपा सुप्रीमों ने सादगी के साथ चाचा रामगोपाल और प्रस्तावकों के साथ जिला निर्वाचन अधिकारी की मौजूदगी में शपथ लेते हुये अपना नामांकन पत्र दाखिल किया।
अपना नामांकन दाखिल करने के उपरांत अखिलेश ने कहा कि, कन्नौज की जनता परिवर्तन चाहती थी, इस कारण मुझे कन्नौज से चुनाव लड़ने का निर्णय लेना पड़ा।
अब आगे कन्नौज लोकसभा क्षेत्र की जनता की जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि, इस बार कन्नौज इतिहास लिखेगा और कन्नौज में क्रांति होकर रहेगी।
अखिलेश ने कहा कि, फिर इतिहास दोहराया जाएगा, अब नया भविष्य बनाया जायेगा,, यह कहते हुये एक 24 साल पुरानी फोटो भी सोशल मीडिया पर शेयर की। इस फोटो में अखिलेश नामांकन करते हुये नजर आ रहे हैं।उनके साथ समर्थक, नेता, और पूर्व नेता स्व. अमर सिंह भी मौजूद हैं।
अखिलेश ने यह भी कहा है कि, सुगंध की नगरी सकारात्मक राजनीति के जवाब के रूप में नकारात्मक राजनीति करने वाली भाजपा को जिस तरह की पराजय की ओर ले जा रही है, इतिहास में उसे कन्नौज क्रांति के रुप में जाना जायेगा।
जनतंत्र में जनता की मांग ही सर्वोपरि होती है। कन्नौज के हर गांव, गली, गलियारे से जो आवाज उठ रही है वो अब नया इतिहास लिखेगी।
बताते चलें कि सपा की पिछली पृष्ठभूमि में देखें तो पता चलता है कि, साल 2009 के चुनाव में अखिलेश ने कन्नौज से अपनी जीत की हैट्रिक लगाया थी। 3,37, 751बोट पाकर अखिलेश ने अपने प्रतिद्वंदी डा. महेश वर्मा को 1,15,864 वोटों से हराया था।
इसके बाद यहां की कन्नौज सीट छोड़ते हुये अपनी पत्नी डिंपल यादव को मैदान में उतार दिया था। आखिर सीट छोड़ने के बाद कराये गये उपचुनाव में 2012 में डिंपल यादव यहां से निर्विरोध जीती। उनको पॉलिटिकल लांचिंग जीत मिली।
जीत का यह सिलसिला इतिहास बनता चला गया और 2014 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर सपा ने कन्नौज सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखा। और संपन्न हुये चुनाव में डिंपल यादव को फिर जीत का सेहरा पहनाया गया।
इसी सीट पर अगर कुछ और पीछे जाय, तो पता चलता है कि, इसी कन्नौज सीट से सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने साल 1999 में यहां से अपनी जीत का परचम फहराया था और सपा को संजीवनी दी थी।
मुलायम की जीत के अगले साल ही साल 2000 में फिर उपचुनाव हुआ और अखिलेश यादव की पहली जीत कन्नौज के इतिहास में दर्ज हो गई।
लगातार फिर साल 2004 के चुनाव में अखिलेश यादव फिर से जीते और सपा का जलवा कायम रखा। साल 2009 के चुनाव में एक बार फिर अखिलेश ने कन्नौज में अपनी जीत की हैट्रिक लगाई और कन्नौज को सपा के गढ़ का दर्जा दिला दिया।
इस हैट्रिक के बाद यहां बदलाव की शुरुआत का सिलसिला शुरू हुआ।
कन्नौज की सीट से अखिलेश को अलग होता और कन्नौज से दूरी बनाते देख यहां की जनता और पार्टी के नेता, समर्थक और कार्यकर्ता जहां मुखर से नजर आने लगी वहीं बीजेपी की सरकार में भाजपा की विजय पताका फहराई गई। और सुब्रत पाठक ने अपना खाता खोला।
साल 2019 के चुनाव में अब अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल के सामने बीजेपी सरकार के प्रत्याशी सुब्रत पाठक मैदान में सामने थे।
आखिर परिवर्तन के दौर का सिलसिला शुरु हुआ और सपा के गढ़ को पहला झटका लगा।
यहां सुब्रत पाठक ने डिंपल को 5,63,087 बोट पाकर 12353 कन्नौज सीट से हरा दिया।
एक बार फिर साल 2024 के चुनाव में सुब्रत पाठक पर ही बीजेपी ने भरोसा जताया और कन्नौज सीट से ही अपना प्रत्याशी घोषित किया।
उधर सपा का प्रत्याशी घोषित करने को लेकर कन्नौज सीट पर लगातार 40 दिनों तक असमंजस और उथल पुथल का आलम रहा।
आखिर बीते बुधवार की रात माहौल और पार्टी नेताओं से लेकर जनमानस का मन टटोलते हुये प्रत्याशी तेज प्रताप के नाम पर लग चुकी मोहर को भी कैंसिल कर दिया गया। और आखिर में सपा सुप्रीमों अखिलेश यादव ने कन्नौज से खुद लड़ने का फैसला लिया।
गुरुवार को आखिर कन्नौज से अखिलेश यादव ने सभी तर्क वितर्क पर विराम लगाते हुये अपना नामांकन पत्र दाखिल कर चुनाव का आगाज कर दिया।
कन्नौज सीट से अखिलेश के नामांकन के बाद अब कन्नौज सीट प्रदेश में हॉट सीट ही चुकी है। आगामी चुनाव का मतदान और जनता का फैसला इस बार देखने लायक हो गया है।
फिलहाल सपा इस सीट पर अब अपनी पूरी ताकत झोंकने के मूड में नजर आ रही है।