
Aghori Sadhu: महाकुंभ के दौरान अलग-अलग संप्रदाय और विभिन्न वेशभूषा के साधु-संत पवित्र स्नान करने के लिए संगम के तट पर एकत्रित हुए हैं। किसी ने लाल रंग के वस्त्र धारण किए हैं तो कोई नर्वस्त्र है। ये सभी साधु-संत अपनी भिन्न छवि के लिए जाने जाते हैं। इन्हीं संतों में अघोरी भी आते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि अघोरी कैसे बनते हैं और उनकी जीवन शैली कैसी होती है?
किसके उपासक होते हैं अघोरी
अघोरी साधुओं का जीवन बहुत रहस्यमयी होता है। यह भगवान शिव और मां काली के सच्चे उपासक होते हैं। अघोरी शब्द संस्कृत भाषा से निकला है, जिसका अर्थ है निर्भय। यह भारतीय तंत्र परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माने जाते हैं। अघोरी बनने के लिए साधना, त्याग, और एक विशेष जीवनशैली को अपनाना पड़ता है। यह अपने तन पर भस्म रमाते हैं, गले में रुद्राक्ष की माला और नर मुंड धारण करते है।
अघोरी बनने की प्रक्रिया
अघोरी बनने के लिए साधकों को कठिन तपस्या और साधना करनी पड़ती है। सबसे पहले, वे किसी गुरु की शरण में जाते हैं, जो उन्हें तंत्र विद्या और योग का ज्ञान देते हैं।
गुरु की शरण: अघोरी बनने का पहला कदम गुरु का आशीर्वाद प्राप्त करना है। गुरु अपने शिष्य को तंत्र और साधना के गहरे रहस्यों से परिचित कराते हैं।
त्याग और तपस्या: अघोरी बनने के लिए साधक को सभी भौतिक सुख-सुविधाओं का त्याग करना होता है।
शमशान साधना: अघोरी अपनी साधना का मुख्य भाग शमशान में करते हैं, क्योंकि इसे तंत्र साधना का प्रमुख केंद्र माना जाता है।
भय का त्याग: अघोरी बनने के लिए साधक को हर प्रकार के भय, विशेषकर मृत्यु के भय, से मुक्त होना पड़ता है।