Friday, April 4, 2025
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कानपुर में गणेश शंकर विद्यार्थी के आवास में खुल गया शराब का ठेका

विद्यार्थी जी के सम्मान को ठेस पहुंचा रहा अंग्रेजी शराब का ठेका

कानपुर के तिलक नगर स्थित उनके बंगले में खुल गई शराब दुकान का विरोध शुरू

कानपुर में हिंदी पत्रकारिता के पितामह के तौर पर जाने जाते हैं गणेश शंकर विद्यार्थी

स्वराज इंडिया न्यूज ब्यूरो

कानपुर। उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में विद्यार्थी महज़ एक विद्यालय में पढ़ने वाला छात्र नहीं है। विद्यार्थी इस शहर की पत्रकारिता में पनपने वाली एक सोच का नाम है। यहां पर हम जिस विद्यार्थी की बात कर रहे हैं उन्हें आजाद भारत के अंदर हिंदी पत्रकारिता के पितामाह के तौर पर गणेश शंकर विद्यार्थी के नाम से जाना जाता है। प्रगाढ़ अध्ययन करके अपनी पत्रकारिता की दम पर उन्होंने ऐसे-ऐसे लेख लिख डाले जिन्होंने सीधे-सीधे अंग्रेजी हुकूमत की जड़ों पर वार किया।
संगम तट के किनारे बसी प्रयागराज नगरी के अतरसुइया मोहल्ले में बने दुर्गा पूजा पार्क के पास अपने ननिहाल में सन् 1890 में जन्मे गणेश शंकर विद्यार्थी मूलतः उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के हथगांव के निवासी थे। माता का नाम गोमती देवी था वही पिता ग्वालियर रियासत में मुंशी के तौर पर कार्यरत थे। शुरुआती शिक्षा मध्य प्रदेश के मुंगावली में ग्रहण करने के बाद आगे की शिक्षा 1907 में प्रयागराज की कायस्थ पाठशाला से ग्रहण की। पत्रकारिता के क्षेत्र में स्वयं के झुकाव को देखते हुए उस समय के अंग्रेजी के लेखक सुंदरलाल कायस्थ के शिष्य के तौर पर उनसे पत्रकारिता का ज्ञान अर्जित करना शुरू किया। 1908 में कानपुर का रुख करने के बाद उन्होंने पृथ्वीनाथ हाई स्कूल में एक शिक्षक के तौर पर भी कुछ दिन कार्य किया। बाद में कोलकाता के अखबार हितवार्ता के लिए लेख लिखने लगे और 9 नवंबर 1913 को कानपुर में ही अपने तीन साथी शिव नारायण मिश्र, नारायण प्रसाद अरोड़ा और यशोदानंदन के साथ मिलकर ‘प्रताप’ अखबार की नींव डाली जिसके वह स्वयं संपादक थे। लोकमान्य तिलक को अपना राजनीतिक गुरु मानकर गणेश शंकर विद्यार्थी जी का भारतीय राजनीति में भी अहम योगदान रहा। आज जहां मीडिया पर सांप्रदायिक होने का आरोप लगता रहता है. वहीं गणेश शंकर विद्यार्थी एक ऐसे पत्रकार थे जिन्होंने साम्प्रदायिक दंगों को शांत कराने में अपने प्राणों की आहुति दे दी 23 मार्च 1931 को भगत सिंह को फांसी होती है, उसके विरोध में पूरे देश में बंद बुलाया गया अंग्रेजों की भारत को सांप्रदायिकता की आग में झोंकने की नीति कामयाब होने लगी थी इसी दौरान कानपुर में भयावह दंगा भड़क उठा 25 मार्च का दिन था, गणेश शंकर विद्यार्थी हिंसा के बीच में जाकर उन्होंने हिंदुओ की भीड़ से मुस्लिमों को और मुस्लिमों की भीड़ से हिंदुओं को बचाया इसी बीच वो दो गुटों के बीच में फंस गए साथियों ने उनसे निकलने को कहा लेकिन फिर भी वो लोगों को समझाने में लगे रहे स्थिति ऐसी बनी कि उग्र होती भीड़ हिंसक हो उठी और फिर उस हिंसक भीड़ से गणेश शंकर विद्यार्थी कभी जीवित नहीं लौटे। भीड़ ने धारदार हथियारों से उनके शरीर पर इतने प्रहार किए कि दो दिन बाद जब लाश मिली तो पहचाना मुश्किल था इस तरह महान क्रांतिकारी निर्भीक पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी दंगों को रोकने के प्रयास में 40 वर्ष की अल्पायु में शहीद हो गए। यही वह सारी बातें हैं जो इस शख्सियत को महान बनाती हैं।
यहां तक तो गणेश शंकर विद्यार्थी से जुड़ी अहम जानकारी आपके सामने प्रस्तुत की गई है पर अब अपनी असल खबर की ओर आते हैं कि किस वजह से अचानक इस महान पुरुष के लिए खबर लिखी जा रही है। कानपुर के तिलक नगर इलाके में गणेश शंकर विद्यार्थी का विशाल आवास है जिसमें उनके पारिवारिक जन रहते हैं। उनके द्वारा अपने परिवार और इस राष्ट्र के आदर्श गणेश शंकर विद्यार्थी जी के सम्मान के खिलाफ जाकर ऐसी कलंक गाथा तैयार की गई है जिसका अब कानपुर शहर के सामाजिक व्यक्तित्व रखने वाले लोग विरोध कर रहे हैं।

समाज सेविका नंदिता तिवारी ने डीएम से की शिकायत

गणेश शंकर विद्यार्थी के आवास के एक हिस्से में एक अंग्रेजी शराब की दुकान को खोला गया है जो सीधे-सीधे इस महान इंसान के सम्मान पर बदनुमा धब्बा लगाने का काम कर रही है। शहर की समाज सेविका नंदिता तिवारी के द्वारा कानपुर के जिला अधिकारी को प्रार्थना पत्र देकर इस कुंठित गतिविधि के खिलाफ शिकायत की गई है। जिसमें उन्होंने यह निवेदन किया है कि 26 अक्टूबर को विद्यार्थी जी के जन्मदिन के पहले-पहले इस शराब की दुकान को वहां से बंद करा कर कहीं और स्थानांतरित किया जाए।

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